गुरुवार, 7 अप्रैल 2011

ज्योतिबा फुले को मिली थी स्वामी दयानन्द सरस्वती से प्रेरणा




ज्योतिबा फुले को मिली थी स्वामी दयानन्द सरस्वती से प्रेरणा
हमने कुछ लेखों में यह लिखा है कि महात्मा फुले स्वामी दयानंद संस्वती के सामाजिक सुधार कार्यक्रमों के प्रशंसक थे व फुले को भी उनके क्रांतिकारी विचारों एवं कार्यों से प्रेरणा मिली थी समाज के कुछ विचारकों ने फुले का सम्बंध स्वामी दयानंद से जोडऩे पर आपति की है, महज इस आधार पर कि स्वामी दयानंद जन्म से ब्राह्मण थे। केवल जन्म से ब्राह्मण होने से कोई व्यक्ति त्याज्य नहीं माना जा सकता है। ज्योतिबा फुले सामाजिक एवं सांस्कृतिक क्रांति के प्रकाश दीप थे, किन्तु स्वामी दयानंद भी इसी श्रेणी में आते हैं। जन्म से ब्राह्मण होते हुए भी दयानंद प्रगतिशील एवं सुधारवादी सोच के धनी थे। इसीलिए उन्होंने ब्राह्मणवादी व्यवस्था, पाखण्ड, आडम्बर, रूढिवाद एवं धर्म के नाम पर की जाने वाली ठगबाजी का विरोध किया।
स्वामी दयानन्द के समाज-सुधारक व्याख्यान करवाने के लिए कुछ सुधारवादी लोगों ने स्वामी दयानंद को पूना में आमंत्रित किया। प्रतिक्रियावादी तत्वों ने उनको पूना में बुलाने का विरोध किया व उत्पात करने की चेतावनी दे दी। व्याख्यान के आयोजकों ने फुले से मदद मांगी। फुले ने इस आयोजन की प्रशंसा की व अपने सत्यशोधक समाज के कार्यकर्ताओं का पूर्ण सहयोग दिया।
5 सितम्बर 1875 को पूना में स्वामी दयानंद सरस्वती को हाथी पर बैठाकर नगर के मुख्य मार्गों से शोभा यात्रा निकाली गई। इस यात्रा में महात्मा फुले अपने कार्यकर्ताओं के साथ उपस्थित थे। हाथी के दोनों ओर ज्योतिबा फुले व तत्कालीन समाज सुधारक महादेव गोविन्द रानाडे पैदल चल रहे थे।
इन लोगों ने कई दिन तक हुए स्वामी दयानंद के प्रवचनों को लिपिबद्ध करवाया व पुस्तक रूप में छपवाकर बांटा। यह पुस्तक आज भी पूना-प्रवचन के नाम से उपलब्ध है।
किसी ऐतिहासिक तथ्य को झुठलाना, दबाना या मिटाना कोई अच्छी चेष्टा नहीं है। सत्य को स्वीकार करने के लिए सर्वदा तत्पर रहना चाहिए। - आचार्य रामगोपाल सैनी, फतेहपुर शेखावाटी (सीकर)

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