गुरुवार, 11 जनवरी 2018

परमार वंश वैशाख सूद 5

मूल पुरुष : परमार
वंश : अग्निवंश (सूर्यवंश)
गौत्र : वशिष्ट
कुलक्षेत्र : आबू पर्वत
तिथि : पांचम
महीनों : वेशाख
वार : गुरु
पागडी : पचरंगी
झडो : त्रीबधी
जाज़म : सूवा पंखी
नदी : सफरा
धोडो : कवलीयौ
साखा: माधवी
ढाल : हरीपंख
तलवार : रणतर
वुक्ष: आबो
गाय : कवली गाय
गणपति : ऐकदत
भेरव : गोरा भेरव
गुरु : गोरखनाथ
निशान : केसरीसिंह
शस्त्र : भालो
वेद : यजुर्वेद
भाम्र्न :राजगौर
बेसणु : उज्जेन
प्रवर : पांच
महादानेश्वरी : राजा भोज
भूदाने श्वर : राजा राम
सूवण दानेश्वरी : सोढ़ा जी परमार
कुंड : अनलकुंड
वीरवत : राजाविक्रम
परदुख भंजन : राजा वीर विक्रमादित्य
आध : पुस्तराज
प्राणदाता : इंद्र
नगरी : चंद्रावती
क्षमादान : राजा मूँज
इष्टदेवी : हरसीधी माँ
कुलदेवी : सचियाय माँ
पीर : पिथौराजी
सत्य .................न्याय.....................भक्ति
परमार(पँवार) वंश कि उत्पत्ति राजस्थान के आबू पर्वत में स्थित अनल कूण्ड हुई थी तथा चन्द्रावती एव किराडू दो मुख्य राजधानीया भी राजस्थान में ही थी यही से परमार(पँवार) मालवा गये एवं उज्जैन(अवतीका) एवं धार(धारा) को अपनी राजधानी बनाया भारत वर्ष में केवल परमार(पँवार)वंश ही एक मात्र ऐसा वंश हैं जिसमें चक्रवर्ती सम्राट हुई इसलिए यह कहा जाता है कि.
# पृथ्वी_तणा_परमार_पृथ्वी_परमारो_तणी . यानी धरती की शोभा परमारो से है या इस धरती की रक्षा का दायित्व परमारो का है परमार राजा दानवीर साहित्य व शौर्य के धनी थे तथा वे कृपाण एवं कलम दोनों में दक्ष थे उनका शासन भारत के बाहर. दूसरे देशों तक था लेकिन राजा भोज के पश्चात परमार सम्राट का पतन हो गया एवं परमारो के पतन होते ही भारत वर्ष मुसलमानों के अधिक हो गया अर्थात परमारो का इतिहास बहुत ही गौरव शाली रहा है जो जागृति के अभाव में लुप्त प्रायः हो गया अब हमें पुनः गौरव शाली इतिहास को बहाल करना है
(1) अनल कुण्ड (आबू पर्वत)_परमार कि उत्पत्ति.स्थल
(2) चंद्रावती व किराडू_ परमारो कि राजधानीया
(3) सोढा.संखाला व सच्च़ियाय कि जन्म स्थली_शिव (बाडमैर)
(4) परमारो मे अवतरित शक्तियों स्थली जैसे..सच्चियाय वाकल.मालन.रूपाद.लालरदे के शक्ति पीठ
(5) परमारो के कोट_अचल गढ़ .जालौर.सिवाणा.ल
ुद्ववा.पूंगल.चितौड.मडोर.तिकाडू.सामर
(6) संत जाम्भोजी ति स्थली.मुकाम
(7) पीर हडबूजी सांखला कि स्थली_बेंगटी
(8) राजस्थान मे निवास करने वाले परमार पँवार_मेहफावत.सोढा.सांखला.भायल.काबा.धांधू. क्रागुंआ.किराडू.गेहलडा.गुंगा.बहिया.उमट.बारड.राज पँवार.इत्यादि.....
जय परमार पँवार राज वंश.
जय माताजी
परमार वंश के सभी भाई ओ को !

"वेंसाख सूद पंचमी"
हे !
भारत वर्ष के सभी परमार वंश के वंशज का
परमार उत्पति दिन

बुधवार, 10 जनवरी 2018

वंशावली

चार हुतासन सों भये कुल छत्तिस वंश प्रमाण

भौमवंश से धाकरे टांक नाग उनमान

चौहानी चौबीस बंटि कुल बासठ वंश प्रमाण."

अर्थ:-दस सूर्य वंशीय क्षत्रिय दस चन्द्र वंशीय,बारह ऋषि वंशी एवं चार अग्नि वंशीय कुल छत्तिस क्षत्रिय वंशों का प्रमाण है,बाद में भौमवंश नागवंश क्षत्रियों को सामने करने के बाद जब चौहान वंश चौबीस अलग अलग वंशों में जाने लगा तब क्षत्रियों के बासठ अंशों का पमाण मिलता है।

सूर्य वंश की दस शाखायें:-

१. कछवाह२. राठौड ३. बडगूजर४. सिकरवार५. सिसोदिया ६.गहलोत ७.गौर ८.गहरवार ९.बल्ला १०.वैस

चन्द्र वंश की दस शाखायें:-

१.जादौन२.भाटी३.तोमर४.चन्देल५.छोंकर६.झाला७.सिलार८.वनाफ़र ९.कटोच१०. सोमवंशी

अग्निवंश की चार शाखायें:-

१.चौहान२.सोलंकी३.परिहार ४.पमार.

ऋषिवंश की बारह शाखायें:-

१.सेंगर२.दिक्खित३.गर्गवंशी(हस्तिनापुर के राजा दुष्यन्त के वंशज)४.दायमा५.गौतम६.अनवार (राजा जनक के वंशज)७.दोनवार८.दहिया(दधीचि ऋषि के वंशज)९.चौपटखम्ब १०.काकन११.शौनक १२.बिसैन

चौहान वंश की चौबीस शाखायें:-

१.हाडा २.खींची ३.सोनीगारा ४.पाविया ५.पुरबिया ६.संचौरा ७.मेलवाल८.भदौरिया ९.निर्वाण १०.मलानी ११.धुरा १२.मडरेवा १३.सनीखेची १४.वारेछा १५.पसेरिया १६.बालेछा १७.रूसिया १८.चांदा१९.निकूम २०.भावर २१.छछेरिया २२.उजवानिया २३.देवडा २४.बनकर.

|<| परमार |>| 

¤वंश - अग्निवंश
¤वेद - यजुर्वेद
¤गौत्र - वशिष्ठ 
¤नदी - क्षिप्रा
¤इष्टदेव - महाकाल या कालभैरव
¤कुलदेवी - श्री संचावलीजी या गजानन माता धार
¤शाखा - वाजसनेयी या माध्यन्दिनी
¤सूत्र - पारस्कार ग्रह्म सूत्र
¤प्रवर - वशिष्ठ या अत्रि
¤व्रक्ष - कदम्ब या पीपल
¤शाखाएँ - पैँतीस
¤प्रमुख गददी - धारानगरी या उज्जैन
¤उपवेद - धनुर्वेद
¤कुलगुरू - वशिष्ठ या पाराशार
¤ध्वज - पीत या पीला
¤नोबत - बजरंग
¤नगारा - विजय बम्ब
¤पक्षी - मयूर
¤धूणी - हराड़ी
¤भैरव - कालभेरू
¤गढ़ - आबू
¤ढोल - बाजुवार
¤नगारची - डीरा
¤तलवार - तेंग
¤उपाधि - सवाई
¤घोड़ा - कुमेत
¤प्रणाम - जय शंकर या जय महाकालेश्वर
¤तिलक - शिव तिलक
¤बंधेज - जीमणा
¤कुंड - अग्नि कुंड
¤निशान - पीला
 

|<|परमारोँ की वंशावळी|>|
 


¤-परमार या पंवार
¤-पहुंकर
¤-परुराव या परुख
¤-कलंक कुँवर
¤-सेन
¤-परासेन
¤-भरत
¤-भांण
¤-चन्द्र
¤-किलंग इन्द्र
¤-हंस
¤-श्री हंस
¤-चतरंगदे
¤-गंध्रपसेन
¤-वीर विक्रमदे या राजा विक्रमादित्य
¤-विक्रमसत या वीकमचित्र
¤-भीमसुख
¤-बलूदेव
¤-पत
¤-भूपत
¤-राजा जयधमल
¤-वीसल
¤-श्यामभाण
¤-शकत कुँवर
¤-वीरुचंद
¤-महेपाल डंड
¤-प्रथ्वी डंड
¤-गौपिड़
¤-गौ देव या महापिंड
¤-राजा कारथेन
¤-राजा संहस
¤-सतये कुँवर 
¤-वीरपाल
¤-विजयेराज
¤-श्यामजी
¤-राजा सिँघलसेन
¤-राजा भोज धार के राजा
¤-राजा बंधजी
¤-राजा उदयाजीतजी
¤-राजा जगदेव
¤-डाभरखजी 
¤-धंधूमालजी*
¤-राजा धोमजी* 

*
clarification needed 
डाभरखजी से धोमजी से  राजा धरमदेवजी से धांधू से धरणी वाराह से बाहड़ से 
सोढा और सांखला* 
¤-ओपतरावजी*
¤-अपररावजी*
¤-बाहड़रावजी*
¤-सोढा सांखला*
¤-चाचकदेवजी
¤-रायकदेजी
¤-जेभजी
¤-जसडजी
¤-सोमेसरजी
¤-धरावरेस
¤-दुर्जणजी
¤-खीँवजी राणा
¤-अवतारदे
¤-थिरोजी
¤-हमीरजी
¤-बीसोजी
¤-तेजसिँहजी
¤-चांपोजी
¤-गांगोजी
¤-प्रतापजी
¤-चन्द्रजी
¤-भोजराजजी
¤-जसंवतजी
¤-जगमालजी
 

|<|परमारोँ की खांपेँ|>|
 

¤-वराह
¤-लोदरवा परमार
¤-बूंटा परमार
¤-चन्ना
¤-मोरी
¤-सुमरा
¤-ऊमट
¤-बीहल
¤-डोडिया
¤-सांखला
¤-भायला
¤-भाभा
¤-हूण
¤-सांवत
¤-बारड
¤-सुजान
¤-कुन्तल
¤-उधला्‌
¤-बलिला
¤-गुंगा
¤-गहलड़ा
¤-सिँधल
¤-नांगल
¤-थिरिया
¤-जोखा
¤-नल
¤-मदन
¤-पोसवा
¤-खाहर
¤-कालमा
¤-सरबड़िया
¤-सूकला
¤-महपावत
¤-ढेकहा परमार
 

सोढ़ा परमार की खांपे


¤-सोढा
¤-भाण सोढा
¤-केलण सोढा
¤-नागड़ सोढा
¤-संग्रामसी सोढा
¤-वैरसी सोढा
¤-अखा सोढा
¤-नदा सोढा
¤-लूवामान सोढा
¤-सीँधल सोढा
¤-सांध सोढा
¤-भुजबल सोढा
¤-सादुल सोढा
¤-मानसिँह सोढा
¤-गंगादास सोढा
¤-राम सोढा
¤-नबा सोढा
¤-मालदे सोढा
¤-लरा सोढा
¤-देवा सोढा
¤-बरजांग सोढा
¤-उदा सोढा
¤-महराण सोढा
¤-अखैराज सोढा
¤-जैतमाल सोढा
¤-सूरा सोढा
¤-मधा सोढा
¤-धोधा सोढा
¤-तेजमालोत सोढा
¤-करनिया सोढा
¤-विजैराण सोढा
¤-नरसिँह सोढा
¤-सुरतान सोढा
¤-नगरपाल सोढा
¤-जोधा सोढा
¤-आसरवा सोढा
¤-दूदा सोढा
¤-पता सोढा
¤-रायब सोढा
¤-अर्जुनोत सोढा
¤-देपाल सोढा
¤-सतला सोढा
¤-वीरमदे सोढा
¤-भारमल सोढा
¤-टप्पा सोढा
¤-मला सोढा
¤-भेरवाणी सोढा
¤-भारसार सोढा
¤-डला/दला सोढा
¤-भोजराज सोढा
¤-कीता सोढा
 

परमारोँ की रियासतेँ :
 


^ मालवा ^
¤-नरसिँहगढ़
¤-राजगढ़
¤-धार
¤-देवास
¤-बख्तगढ़
¤-मथनार
¤-छतरपुर
¤-उमड़वाड़ी
¤-मांड़ू
¤-उज्जैन
¤-धार
¤-माहेश्वर
¤-चन्द्रभागा
 
^ गुजरात ^
¤-दांता
¤-सूथ
¤-मूली
¤-मले
¤-भुखास मेसरी
 
^ बिहार^
¤-डुमराँव
¤-सकरपुरा मुंगेर
 
^ पंजाब ^
¤-बाघल
 
^उत्तर प्रदेश^
¤-टिहरी गढ़वाल
¤-पौढ़ी गढ़वाल
 
^राजस्थान^
¤-आबू
¤-बीजोलिया ठिकाना
¤-लौद्रवा
¤-चन्द्रवती
¤-धौलपुर
 
^हरियाणा^¤-सोनीपत
¤-रोहतक
 
^पाकिस्तान^
¤-अमरकोट
¤-छोर
¤-न्यू छोर 
¤-हवेली
¤-सिन्ध प्रदेश
 

परमारोँ की अतिरिक्त शाखाएं
¤-चावड़
¤-डोड
¤-उज्जैनियां पंवार
¤-गंधवरिया
¤-मालवीय परमार
¤-ढेकहा परमार
¤-भुवाल परमार
¤-भोजपुरिया
¤-सुमरा
¤-वराह
¤-चावड़ा वंश
¤-भाले अलीगढ
¤-कहम
¤-मानको
¤-उडिया
¤-बकछाहा
¤-खेरत
¤-चारटे
¤-मेपाती
¤-बलहार
¤-रेहार
¤-सोराठिया
¤-हरेरा
¤-बरकोटा
¤-सम्पल
¤-कालपुसर
¤-होकम्मा
¤-पुसया
¤-डबगार
¤-चढ़ेले
¤-निबाह
¤-धुरा
¤-शाहपुरिया
¤-मुजेले
¤-गन्धीवार

सोमवार, 1 जनवरी 2018

सैनी समाज का इतिहास
                            - अलका सैनी,चंडीगढ़
सैनी भारत की एक योद्धा जाति है. सैनी, जिन्हें पौराणिक साहित्य में शूरसैनी के रूप में भी जाना जाता है, उन्हें अपने मूल नाम के साथ केवल पंजाब और पड़ोसी राज्यहरियाणा, जम्मू और कश्मीर और हिमाचल प्रदेश में पाया जाता है. वे अपना उद्भव यदुवंशी]सूरसेन वंश के राजपूतों से देखते हैं, जिसकी उत्पत्ति यादव राजा शूरसेन से हुई थी जो कृष्ण और पौराणिक पाण्डव योद्धाओं, दोनों के दादा थे. सैनी, समय के साथ मथुरा से पंजाब और आस-पास की अन्य जगहों पर स्थानांतरित हो गए.
प्राचीन ग्रीक यात्री और भारत में राजदूत, मेगास्थनीज़ का परिचय भी सत्तारूढ़ जाति के रूप में जाती से इसके वैभव दिनों में हुआ था जब इनकी राजधानी मथुरा हुआ करती थी. एक अकादमिक राय यह भी है कि सिकंदर महान के शानदार प्रतिद्वंद्वी प्राचीन राजा पोरस, कभी सबसे प्रभावी रहे इसी यादव कुल के थे. मेगास्थनीज़ ने इस जाति कोसौरसेनोई के रूप में वर्णित किया है.
राजपूत से उत्पन्न होने वाली पंजाब की अधिकांश जातियों की तरह सैनी ने भी तुर्क-इस्लाम के राजनीतिक वर्चस्व के कारण मध्ययुगीन काल के दौरान खेती को अपना व्यवसाय बनाया, और तब से लेकर आज तक वे मुख्यतः कृषि और सैन्य सेवा, दोनों में लगे हुए हैं. ब्रिटिश काल के दौरान सैनी को एक सर्वाधिक कृषि जनजाति के रूप में और साथ ही साथ एक सैन्य वर्ग के रूप में सूचीबद्ध किया गया था.
सैनियों का पूर्व ब्रिटिश रियासतों, ब्रिटिश भारत और स्वतंत्र भारत की सेनाओं में सैनिकों के रूप में एक प्रतिष्ठित रिकॉर्ड है. सैनियों ने दोनों विश्व युद्धों में लड़ाइयां लड़ी और 'विशिष्ट बहादुरी' के लिए कई सर्वोच्च वीरता पुरस्कार जीते.सूबेदार जोगिंदर सिंह, जिन्हें 1962 भारत-चीन युद्ध में भारतीय-सेना का सर्वोच्च वीरता पुरस्कार,परमवीर चक्र प्राप्त हुआ था, वे भी सहनान उप जाति के एक सैनी थे.
ब्रिटिश युग के दौरान, कई प्रभावशाली सैनी जमींदारों को पंजाब और आधुनिक हरियाणा के कई जिलों में जेलदार, या राजस्व संग्राहक नियुक्त किया गया था.
सैनियों ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में भी हिस्सा लिया और सैनी समुदाय के कई विद्रोहियों को ब्रिटिश राज के दौरान कारावास में डाल दिया गया, या फांसी चढ़ा दिया गया या औपनिवेशिक पुलिस के साथ मुठभेड़ में मार दिया गया.
हालांकि, भारत की आजादी के बाद से, सैनियों ने सैन्य और कृषि के अलावा अन्य विविध व्यवसायों में अपनी दखल बनाई. सैनियों को आज व्यवसायी, वकील, प्रोफेसर, सिविल सेवक, इंजीनियर, डॉक्टर और अनुसंधान वैज्ञानिक आदि के रूप में देखा जा सकता है. प्रसिद्ध कंप्यूटर वैज्ञानिक, अवतार सैनी जिन्होंने इंटेल के सर्वोत्कृष्ट उत्पाद पेंटिअम माइक्रोप्रोसेसर के डिजाइन और विकास का सह-नेतृत्व किया वे इसी समुदाय के हैं. अजय बंगा, भी जो वैश्विक बैंकिंग दिग्गज मास्टर कार्ड के वर्तमान सीईओ हैं एक सैनी हैं. लोकप्रिय समाचार पत्र डेली अजीत, जो दुनिया का सबसे बड़ा पंजाबी भाषा का दैनिक अखबार है उसका स्वामित्व भी सैनी का है.
पंजाबी सैनियों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा अब अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन आदि जैसे पश्चिमी देशों में रहता है और वैश्विक पंजाबी प्रवासियों का एक महत्वपूर्ण घटक है.
सैनी, हिंदू और सिख, दोनों धर्मों को मानते हैं. कई सैनी परिवार दोनों ही धर्मों में एक साथ आस्था रखते हैं और पंजाब की सदियों पुरानी भक्ति और सिख आध्यात्मिक परंपरा के अनुरूप स्वतन्त्र रूप से शादी करते हैं.
अभी हाल ही तक सैनी कट्टर अंतर्विवाही क्षत्रिय थे और केवल चुनिन्दा जाति में ही शादी करते थे. दिल्ली स्थित उनका एक राष्ट्रीय स्तर का संगठन भी है जिसे सैनी राजपूत महासभा कहा जाता है जिसकी स्थापना 1920 में हुई थी.
इतिहास
" The above group of Yadavas came back from Sindh to Brij area and occupied Bayana in Bharatpur district. After some struggle the 'Balai' inhabitants were forced by Shodeo and Saini rulers to move out of Brij land and thus they occupied large areas.".[१६]
– Encyclopaedia Indica: India, Pakistan, Bangladesh, Volume 100, pp 119 - 120
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प्राचीन भारत के राजनीतिक मानचित्र में ऐतिहासिक सूरसेन महाजनपद. सैनियों ने इस साम्राज्य पर 11 ई. तक राज किया (मुहम्मदन हमलों के आरंभिक समय तक). [
भौगोलिक वितरण और तुलनात्मक जनसंख्या
1881 की जनगणना के अनुसार, जो सबसे प्रामाणिक रिकॉर्ड है क्योंकि यह उस समय से पहले की है जब हर प्रकार के समूहों ने सैनी पहचान को अपनाया, सैनी अविभाजित पंजाब के बाहर नहीं मिलते थे जिसका वर्तमान अर्थ निम्नलिखित राज्यों से है:
  • पंजाब
  • हरियाणा
  • हिमाचल प्रदेश
  • जम्मू-कश्मीर
ए. ई. बार्स्टो के अनुसार भौगोलिक वितरण
ए. ई. बार्स्टो के अनुसार 1911 की जनगणना के आधार पर सैनियों की कुल जनसंख्या केवल 113,000 थी और उनकी उपस्थिति मुख्य रूप से दिल्ली, करनाल, अंबाला, और लयालपुर (पाकिस्तान में आधुनिक फैसलाबाद) जिला, जालंधर और लाहौर प्रभागों और कलसिया, नाहन, नालागढ़, मंडी कपूरथला और पटियाला राज्यों तक सीमित थी. उनके अनुसार, उनमें से केवल 400 मुस्लिम थे और बाकी हिंदू और सिख थे. 1881 की जनगणना के अनुसार, सबसे बड़ा सैनी कुल जालंधर डिवीजन के होशियारपुर जिले में था जहां ज़मीन और प्रभाव के मामले में शासन की स्थिति में थे. लाहौर डिवीजन में वे मुख्यतः गुरदासपुर में केंद्रित थे जहां सलाहरिया (सलारिया), सबसे बड़े सैनी कुल के रूप में लौट रहे थे. जम्मू क्षेत्र के सैनी, पड़ोस के गुरदासपुर जिले के सैनियों का अनिवार्य रूप से हिस्सा थे.
ब्रिटिश काल के पंजाब के डिवीजन का वर्तमान परस्पर-संदर्भ
ब्रिटिश पंजाब के जालंधर डिवीजन में निम्नलिखित जिले शामिल थे: कांगड़ा, होशियारपुर, जालंधर, फिरोजपुर, और लुधियाना. लाहौर डिवीजन में निम्नलिखित जिले शामिल थे: लाहौर, अमृतसर, सियालकोट शेखपुरा, गुजरावाला और गुरदासपुर. वर्तमान का रोपड़ जिला विभाजन से पहले अंबाला जिले में था. इसलिए रोपड़ के सैनियों को औपनिवेशिक खातों में उस जिले में शामिल किया गया.
यह बार्स्टो के विवरण से स्पष्ट है कि सैनी की आबादी का अधिकांश हिस्सा उन क्षेत्रों में था जो अब वर्तमान का पंजाब क्षेत्र है, और आबादी का छोटा हिस्सा वर्तमान हरियाणा और हिमाचल प्रदेश में आता था, और उत्तर प्रदेश या राजस्थान में सैनी की कोई जनसंख्या नहीं थी. 1881 की जनगणना में सहारनपुर और बिजनौर में खुद को सैनी में शामिल करने वाले लोगों को सैनी की श्रेणी से 1901 की जनगणना के बाद पिछली जनगणना की खामियों के उजागर होने के बाद बाहर कर दिया गया.
1881 की जनगणना के अनुसार सापेक्ष जनसंख्या
सैनी की आबादी को आजादी के बाद से अलग से नहीं गिना गया है लेकिन उनकी आबादी अन्य समूहों की तुलना में कम है. 1881 के अनुसार सैनी की कुल जनसंख्या पूरे भारत में 137,380 से अधिक नहीं थी जो आगे चलकर 1901 की जनगणना में कम होकर 106,011 हो गईउसी जनगणना में खत्री की कुल जनसंख्या 439089,जबकि 1881 जनगणना के अनुसार जाट की जनसंख्या सम्पूर्ण भारत में 2630,994 थी. इस प्रकार सैनी की आनुपातिक आबादी लगभग खत्री से 1/4 और जाट से 1/25 है. 1896 में लिखे एक मानव जाति विज्ञान की अन्य समकालीन आधिकारिक कृति के अनुसार, जाट जनसंख्या 4,625,523 थी और सैनी जनसंख्या 125,352 थी, जिससे तुलनात्मक अनुपात 1:37 हो गया. यहां तक कि 1881 की जनगणना के आधार पर भी हर सैनी पर 4 खत्री और 25 जाट के साथ यह स्पष्ट है कि संख्यानुसार सैनी अल्पसंख्यक समूहों के अंतर्गत हैं जब इनकी तुलना वर्तमान समय के भारत के पंजाब और हरियाणा के सबसे महत्वपूर्ण जातीय समूहों से की जाती है.
[संपादित करें]ब्रिटिश पंजाब के विभिन्न भागों में प्रमुख सैनी गांव और जागीर
जालंधर जिले के 1904 के औपनिवेशिक रिकॉर्ड के अनुसार सैनी के स्वामित्व में नवाशहर की पूर्वी सीमा के पास और तहसील के दक्षिण पश्चिम में कई गांव थे.
ब्रिटिश काल के जालंधर और नवाशहर तहसील के उन प्रमुख गांवों की सूची निम्नलिखित है जिन पर सैनी का आंशिक या पूर्ण स्वामित्व था:
जालंधर और नवाशहर तहसील (ब्रिटिश पंजाब) रोपड़
  • बेहरोन माजरा (चमकौर साहिब के पास)
  • बीरमपुर (जिला. भोगपुर के पास होशियारपुर) पूरा गांव.
  • लधना (पूरा गांव)
  • झीका (पूरा गांव)
  • सुज्जोंन (पूरा गांव)
  • सुरपुर (पूरा गांव)
  • पाली (पूरा गांव)
  • झिकी (पूरा गांव)
  • भरता (शहीद भगत सिंह नगर के पास)
  • लंग्रोया (शहीद भगत सिंह नगर के पास)
  • सोना (शहीद भगत सिंह नगर के पास)
  • मेहतपुर (शहीद भगत सिंह नगर के पास)
  • अलाचौर (शहीद भगत सिंह नगर के पास)
  • कहमा (शहीद भगत सिंह नगर के पास)
  • बंगा शहर (बंगा सैनियों का आखिरी नामा है)(शहीद भगत सिंह नगर के पास)
  • चक (पूरा गांव)
  • खुर्द (पूरा गांव)
  • दल्ली (पूरा गांव)
  • गेहलर (पूरा गांव)
  • सैनी मजरा (पूरा गांव)
  • देसु माजरा, मोहाली के निकट (पूरा ग्राम)
  • रोपड़ के पास हवाली (पूरा ग्राम)
  • लारोहा (लगभग पूरा गांव)
  • नांगल शहीदान (लगभग पूरा गांव)
  • भुन्दियन (लगभग पूरा गांव, 5/6)
  • उरपुर (भाग 3/4 या 75%)
  • बाजिदपुर (भाग 3/4 या 75%)
  • पाली ऊंची (भाग- 1/3 या 33%)
  • नौरा (भाग- 1/2 या 50%)
  • गोबिंदपुर (भाग- 1/4 या 25%)
  • काम (भाग- 1/4 या 25%)
  • दीपालपुर (भाग -1/2 या 50%)
  • बालुर कलन (अनुपात ज्ञात नहीं)
  • खुरदे (ज्ञात नहीं अनुपात)
  • दुधाला (भाग ज्ञात नहीं अनुपात)
  • दल्ला (1/2 या 50%)
  • जन्धिर (1/2 या 50%)
  • चुलंग (1/3 या 33%)
  • गिगंवल (1/2 या 50%)
  • लसरा (1/2 या 50%) नोट: यह गांव फिल्लौर तहसील में है.
  • अड्डा झुन्गियन (पूरा गांव)
  • खुरामपुर (75%) तहसील फगवाड़ा
  • अकालगढ़ (नवा पिंड) (75%) तहसील फगवाड़ा
  • फादमा (तहसील होशियारपुर)
  • भुन्ग्रानी (होशियारपुर तहसील)
  • हरता (तहसील होशियारपुर) 90%
  • बदला (तहसील होशियारपुर) 90%
  • मुख्लिआना (तहसील होशियारपुर) 90%
  • राजपुर (तहसील होशियारपुर) 90%
  • कडोला (आदमपुर के निकट)
  • राजपुर (तहसील होशियारपुर)
  • टांडा (तहसील होशियारपुर)
ब्रिटिश पंजाब के जालंधर जिले में उपरोक्त गांवों के अलावा, सैनी, फगवाड़ा में भी भूस्वामी या जमींदार थे. इस बात पर विधिवत ध्यान दिया जाना चाहिए कि जालंधर जिले की सैनी जनसंख्या 1880 के रिकॉर्ड के अनुसार केवल 14324 थी. इसलिए उपरोक्त सूची में पंजाब में कुल सैनी भूस्वामियों का एक छोटा सा अंश ही शामिल हैं. सबसे बड़ी सैनी जागीर और गांव होशियारपुर में और होशियारपुर जिले के दासुया तहसील में थे जहां वे अधिक प्रभावशाली और अधिक संख्या में थे. अंबाला डिवीजन (जिसमें रोपड़ जिले शामिल है) में भी सैनी स्वामित्व वाले गांवों की एक बड़ी संख्या थी. गुरदासपुर जिले में 54 गांवों पर सैनी का स्वामित्व था.

धर्म

हिन्दू सैनी
हालांकि सैनी की एक बड़ी संख्या हिंदू हैं, उनकी धार्मिक प्रथाओं को सनातनी वैदिक और सिक्ख परंपराओं के विस्तृत परिधि में वर्णित किया जा सकता है. अधिकांश सैनियों को अपने वैदिक अतीत पर गर्व है और वे ब्राह्मण पुजारियों की आवभगत करने के लिए सहर्ष तैयार रहते हैं. साथ ही साथ, शायद ही कोई हिंदू सैनी होगा जो सिख गुरुओं के प्रति असीम श्रद्धा ना रखता हो.
होशियारपुर के आसपास कुछ हिन्दू सैनी, वैदिक ज्योतिष में पूर्ण निपुण है.
अन्य खेती करने वाले और योद्धा समुदायों के विपरीत, सैनियों में इस्लाम में धर्मान्तरित लोगों के बारे में आम तौर पर नहीं सुना गया है.
सिख सैनी
पंद्रहवीं सदी में सिख धर्म के उदय के साथ कई सैनियों ने सिख धर्म को अपना लिया. इसलिए, आज पंजाब में सिक्ख सैनियों की एक बड़ी आबादी है. हिन्दू सैनी और सिख सैनियों के बीच की सीमा रेखा काफी धुंधली है क्योंकि वे आसानी से आपस में अंतर-विवाह करते हैं. एक बड़े परिवार के भीतर हिंदुओं और सिखों, दोनों को पाया जा सकता है.
[1901 के पश्चात सिख पहचान की ओर जनसांख्यिकीय बदलाव
1881 की जनगणना में केवल 10% सैनियों को सिखों के रूप में निर्वाचित किया गया था, लेकिन 1931 की जनगणना में सिख सैनियों की संख्या 57% से अधिक पहुंच गई. यह गौर किया जाना चाहिए कि ऐसा ही जनसांख्यिकीय बदलाव पंजाब के अन्य ग्रामीण समुदायों में पाया गया है जैसे कि जाट, महतो, कम्बोह आदि. सिक्ख धर्म की ओर 1901-पश्चात के जनसांख्यिकीय बदलाव के लिए जिन कारणों को आम तौर पर जिम्मेदार ठहराया जाता है उनकी व्याख्या निम्नलिखित है:
  • ब्रिटिश द्वारा सेना में भर्ती के लिए सिखों को हिंदुओं और मुसलमानों की तुलना में अधिक पसंद किया जाता था. ये सभी ग्रामीण समुदाय जीवन यापन के लिए कृषि के अलावा सेना की नौकरियों पर निर्भर करते थे. नतीजतन, इन समुदायों से पंजाबी हिंदुओं की बड़ी संख्या खुद को सिख के रूप में बदलने लगी ताकि सेना की भर्ती में अधिमान्य उपचार प्राप्त हो. क्योंकि सिख और पंजाबी हिन्दुओं के रिवाज, विश्वास और ऐतिहासिक दृष्टिकोण ज्यादातर समान थे या निकट रूप से संबंधित थे, इस परिवर्तन ने किसी भी सामाजिक चुनौती को उत्पन्न नहीं किया;
  • सिख धर्म के अन्दर 20वीं शताब्दी के आरम्भ में सुधार आंदोलनों ने विवाह प्रथाओं को सरलीकृत किया जिससे फसल खराब हो जाने के अलावा ग्रामीण ऋणग्रस्तता का एक प्रमुख कारक समाप्त होने लगा. इस कारण से खेती की पृष्ठभूमि वाले कई ग्रामीण हिन्दू भी इस व्यापक समस्या की एक प्रतिक्रिया स्वरूप सिक्ख धर्म की ओर आकर्षित होने लगे. 1900 का पंजाब भूमि विभाजन अधिनियम को भी औपनिवेशिक सरकार द्वारा इसी उद्देश्य से बनाया गया था ताकि उधारदाताओं द्वारा जो आम तौर पर बनिया और खत्री पृष्ठभूमि होते थे इन ग्रामीण समुदायों की ज़मीन के समायोजन को रोका जा सके, क्योंकि यह समुदाय भारतीय सेना की रीढ़ की हड्डी था;
  • 1881 की जनगणना के बाद सिंह सभा और आर्य समाज आन्दोलन के बीच शास्त्रार्थ सम्बन्धी विवाद के कारण हिंदू और सिख पहचान का आम ध्रुवीकरण. 1881 से पहले, सिखों के बीच अलगाववादी चेतना बहुत मजबूत नहीं थी या अच्छी तरह से स्पष्ट नहीं थी. 1881 की जनगणना के अनुसार पंजाब की जनसंख्या का केवल 13% सिख के रूप में निर्वाचित हुआ और सिख पृष्ठभूमि के कई समूहों ने खुद को हिंदू बना लिया.
विवाह

कठोर अंतर्विवाही
सैनी, कुछ दशक पहले तक सख्ती से अंतर्विवाही थे, लेकिन सजाती प्रजनन को रोकने के लिए उनके पास सख्त नियम थे. आम तौर पर नियमानुसार ऐसी स्थिति में शादी नहीं हो सकती अगर:]
यहां तक कि अगर लड़के की ओर से चार में से एक भी गोत लड़की के पक्ष के चार गोतसे मिलता हो. दोनों पक्षों से ये चार गोत होते थे: 1) पैतृक दादा 2) पैतृक दादी 3) नाना और 4) नानी. यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि चचेरे या ममेरे रिश्तों के बीच विवाह असंभव था;
दोनों पक्षों में उपरोक्त किसी भी गोत के एक ना होने पर भी अगर दोनों ही परिवारों का गांव एक हो . इस स्थिति में प्राचीन सम्मान प्रणाली के अनुसार इस मामले में, लड़के और लड़की को एक दूसरे को पारस्परिक रूप से भाई-बहन समझा जाना चाहिए.
1950 के दशक से पहले, सैनी दुल्हन और दूल्हे के लिए एक दूसरे को शादी से पहले देखना संभव नहीं था. शादी का निर्णय सख्ती से दोनों परिवारों के वृद्ध लोगों द्वारा लिया जाता था. दूल्हा और दुल्हन शादी के बाद ही एक दूसरे को देखते थे. अगर दूल्हे ने अपनी होने वाली दुल्हन को छिपकर देखने की कोशिश की तो अधिकांश मामलों में या हर मामले में यह सगाई लड़की के परिवार द्वारा तोड़ दी जाती है.
हालांकि 1950 के दशक के बाद से, इस समुदाय के भीतर अब ऐसी व्यवस्था नहीं है यहां तक कि नियोजित शादियों में भी.
[तलाक
ऐतिहासिक दृष्टि से
1955 के हिंदू विवाह अधिनियम से पहले, सैनी व्यक्ति के लिए अपनी पत्नी को तलाक देना संभव नहीं था. तलाक न के बराबर था और इसके खिलाफ बहुत मजबूत सामुदायिक निषेध था और कलंक था. बेवफाई के कारण के अलावा, एक सैनी के लिए यह संभव नहीं था कि वह बिना बहिष्कार का सामना किये और अपने पूरे परिवार के लिए कलंक मोल लेते हुए अपनी पत्नी को छोड़ दे.
लेकिन अगर एक सैनी आदमी अपनी पत्नी को बेवफाई या उसके भाग जाने पर उसे त्याग दे तो सुलह किसी भी परिस्थिति में संभव नहीं था. ऐसी स्थिति में परिणाम अक्सर गंभीर होते थे. इस प्रकार से आरोपित महिला को अपने अधिकांश जीवन बहिष्कार को झेलना पड़ता है. इस प्रकार से त्याग दी गई महिला से समुदाय का कोई भी अन्य आदमी शादी नहीं करेगा. कई मामलों में आरोपित के ऊपर सम्मान हत्या की काफी संभावना रहती है. हालांकि, सभी मामलों में गांव के बुजुर्गों द्वारा किसी भी महिला को दुर्भावनापूर्ण ससुराल वालों द्वारा गलत तरीके से आरोपित करने से रोकने के लिए हस्तक्षेप किया जाता था. ऐसे मामलों में पति का परिवार भी कलंक से बच नहीं पाता था. अतः इस तरह की स्थितियां बहुत कम ही सामने आतीं थीं, सिर्फ तभी जब कोई वास्तविक शिकायत होती.
वर्तमान स्थिति
हालांकि, सैनियों में वर्तमान में अब तलाक की संभावना होती है और इससे कलंक और बहिष्कार को कोई खतरा नहीं रहता.

विधवा पुनर्विवाह
ऐतिहासिक दृष्टि से, सैनियों के बीच विधवा पुनर्विवाह की संभावना, क्षत्रिय या राजपूत के किसी भी अन्य समुदाय की तरह नहीं थी.
लेविरैट विवाह संभव नहीं
सामान्यतया, लेविरैट शादी, या करेवा, सैनी में संभव नहीं था, और बड़े भाई की पत्नी को मां समान माना जाता था, और छोटे भाई की पत्नी को बेटी के समान समझा जाता है. यह रिश्ता भाई की मौत के बाद भी जारी रहता था. एक विवाहित पुरुष सदस्य की मृत्यु के बाद उसकी विधवा के देखभाल करने की जिम्मेदारी सामूहिक होती थी जिसे मृतक का भाई या चचेरे भाई (यदि कोई भाई जीवित नहीं है तो) द्वारा साझा किया जाता था. सैनी के स्वामित्व वाले गांवों में सघन सामाजिक ताने-बाने के कारण, विधवा और उसके बच्चों की देखभाल सामूहिक रूप से गांव के सामुदायिक भाईचारे (जिसे पंजाबी में शरीका कहा जाता था) द्वारा होती थी.
वर्तमान स्थिति
वर्तमान सैनी समुदाय में विधवा पुनर्विवाह के खिलाफ निषेध, खासकर अगर वे कम उम्र में विधवा हो गई हैं तो अब नहीं है या अब लगभग गायब हो गया है यहां तक की पंजाब में भी. हालांकि, गांव आधारित समुदाय में अभी भी कुछ प्रतिरोध किया जा सकता है.

विवाह अनुष्ठान
परंपरागत रूप से, सैनियों का विवाह वैदिक समारोह द्वारा होता रहा है जिसे सनातनी परंपरा के ब्राह्मणों द्वारा करवाया जाता है. हालांकि, 20वीं सदी में कुछ हिंदू परिवार, आर्य समाज आधारित वैदिक अनुष्ठानों को अपनाने लगे हैं, और सिख सैनियों ने आनंद कारज अनुष्ठान का चयन शुरू कर दिया है.

सैनी उप कुल
पंजाबी सैनी समुदाय में कई उप कुल हैं.
आम तौर पर सबसे आम हैं: अन्हे, बिम्ब (बिम्भ), बदवाल, बलोरिया, बंवैत (बनैत), बंगा, बसुता (बसोत्रा), बाउंसर, भेला, बोला, भोंडी (बोंडी), मुंध.चेर, चंदेल, चिलना, दौले (दोल्ल), दौरका, धक, धम्रैत, धनोटा (धनोत्रा), धौल, धेरी, धूरे, दुल्कू, दोकल, फराड, महेरू, मुंढ (मूंदड़ा) मंगर, मसुटा (मसोत्रा), मेहिंद्वान, गेहलेन (गहलोन/गिल), गहिर (गिहिर), गहुनिया (गहून/गहन), गिर्ण, गिद्दा, जदोरे, जप्रा, जगैत (जग्गी), जंगलिया, कल्याणी, कलोती (कलोतिया), कबेरवल (कबाड़वाल), खर्गल, खेरू, खुठे, कुहडा(कुहर), लोंगिया (लोंगिये),सागर, सहनान (शनन), सलारिया (सलेहरी), सूजी, ननुआ (ननुअन), नरु, पाबला, पवन, पम्मा (पम्मा/पामा), पंग्लिया, पंतालिया, पर्तोला, तम्बर (तुम्बर/तंवर/तोमर), थिंड, टौंक (टोंक/टांक/टौंक/टक), तोगर (तोगड़/टग्गर), उग्रे, वैद आदि.
हरियाणा में आम तौर पर सबसे आम हैं: बावल, बनैत, भरल, भुटरल, कच्छल, संदल (सन्डल), तोन्डवाल (टंडूवाल) आदि.
नोट: कुछ सैनी उप कुल डोगरा और बागरी राजपूतों के साथ अतिछादन करता है. कुछ सैनी गुटों के नाम जो डोगरा के साथ अतिछादन करते हैं वे हैं: बडवाल, बलोरिया, बसुता, मसुता, धानोता, सलारिया, चंदेल, जगैत, वैद आदि. ऐतिहासिक रूप से क्षेत्रीय सगोत्र विवाह और सामाजिक भेद भी समुदाय के भीतर था. उदाहरण के लिए, होशियारपुर और जालंधर के सैनी इन जिलों से बाहर विवाह के लिए नहीं जाते थे और खुद को उच्च स्तरीय का मानते थे. लेकिन इस तरह के प्रतिबंध हाल के समय में अब ढीले पड़ चुके हैं और अंतर-जातीय विवाह के मामलों में बढ़ोतरी हुई है विशेष रूप से एनआरआई सैनी परिवारों के बीच.
]अन्य व्यावसायिक जातियों एवं नृजातीय जनजातियों से विभेदित सैनी जनजाति
अराइन या रेइन से विभेदित सैनी
इबेट्सन, औपनिवेशिक नृवंशविज्ञानशास्त्री भी गलती से अरेन या रायेन को सैनी समझ बैठते हैं.
इबेट्सन लगता है व्यावसायिक समुदायों के साथ जातीय समुदायों में भ्रमित हो गए थे. भारतीय मानव विज्ञान सर्वेक्षण के अनुसार माली और अरेन, व्यावसायिक समुदाय हैं, जबकि सैनी एक भिन्न जातीय समुदाय नज़र आते हैं जिनकी उत्पत्ति एक ख़ास भौगोलिक स्थान और विशिष्ट समय पर हुई है जिसके साथ संयोजित है एक अद्वितीय ऐतिहासिक इतिहास जो उनकी पहचान को विशिष्ट बनाता है.

माली (नव-सैनी) से विभेदित सैनी
हरियाणा के दक्षिणी जिलों में और उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान में भी 20वीं सदी में माली जाति के लोगों ने "सैनी" उपनाम का उपयोग शुरू कर दिया.]बहरहाल, यह पंजाब के यदुवंशी सैनियों वाला समुदाय नहीं है. यह इस तथ्य से प्रमाणित हुआ है कि 1881 की जनगणनापंजाब से बाहर सैनी समुदाय के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करती है और इबेट्सन जैसे औपनिवेशिक लेखकों के आक्षेप के बावजूद, सैनी और माली को अलग समुदाय मानती है. 1891 की मारवाड़ जनगणना रिपोर्ट ने भी राजपूताना में किसी 'सैनी' नाम के समुदाय को दर्ज नहीं किया है और केवल दो समूह को माली के रूप में दर्ज किया है. जिनका नाम है महूर माली और राजपूत माली जिसमें से बाद वाले को राजपूत उप-श्रेणी में शामिल किया गया है. राजपूत मालियों ने अपनी पहचान को 1930 में सैनी में बदल लिया लेकिन बाद की जनगणना में अन्य गैर राजपूत माली जैसे माहूर या मौर ने भी अपने उपनाम को 'सैनी' कर लिया.
पंजाब के सैनियों ने ऐतिहासिक रूप से कभी भी माली समुदाय के साथ अंतर-विवाह नहीं किया (एक तथ्य जिसे इबेट्सन द्वारा भी स्वीकार किया गया और 1881 की जनगणना में विधिवत दर्ज किया गया), या विवाह के मामले में वे सैनी समुदाय से बाहर नहीं गए, और यह वर्जना आम तौर पर आज भी जारी है. दोनों समुदाय, सामाजिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक दृष्टि से भी अधिकांशतः भिन्न हैं.
औपनिवेशिक विवरणों में स्वीकार किए गए विभेद '
डेनजिन इबेट्सन के विवरण के अनुसार विभेद
यहां तक कि औपनिवेशिक जनगणना अधिकारियों ने जो सैनियों और मालियों को मिला देने के इच्छुक थे ताकि जटिल सैनी इतिहास और जाति पर आसानी से नियंत्रण कर सकें, उन्हें भी मजबूर हो कर इस टिप्पणी के साथ इस तथ्य को स्वीकार करना पड़ा: "... कि उसी वर्ग की कुछ उच्च जातियां (सैनी)) उनके साथ (माली) शादी नहीं करेंगी.
लेकिन इस उभयवृत्ति के बावजूद औपनिवेशिक खातों में यह दर्ज है कि माली के विपरीत:
  • सैनियों ने मथुरा से राजपूत मूल का दावा किया.
सैनियों को एक "योद्धा जाति " के रूप में सूचीबद्ध किया गया था.
  • सैनी, आम खेती के अलावा केवल बागवानी खेती किया करते थे.
  • सैनी भू-स्वामी थे और कभी-कभी पूरे गांव का स्वामित्व रखते थे.
  • सैनी, माली के साथ शादी नहीं करते थे, और कहा कि, सिवाय शायद बिजनौर के (अब उत्तर प्रदेश में), उन्हें उत्तर पश्चिम प्रांत में माली पूरी तरह से अलग माना जाता था (एक तथ्य जिसके चलते उन्होंने 1881 की जनगणना में सैनी और माली को अलग समुदाय के रूप में दर्ज किया).इस तथ्य पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि बिजनौर के इन तथाकथित सैनियों को 1901 की जनगणना में सैनी से बाहर रखा गया जब 1881 की जनगणना में हुई गलतियों और त्रुटिपूर्ण प्रस्तुतियों को अधिकारियों द्वारा पकड़ा गया.
  • सैनी, पंजाब के बाहर नहीं पाए गए.
जोगेंद्र नाथ भट्टाचार्य द्वारा 19वीं सदी की एक अन्य कृति में भी सैनी समूह को माली से पृथक समझा गया है.
एडवर्ड बाल्फोर के विवरण के अनुसार मतभेद
1885 में एक अन्य औपनिवेशिक विद्वान, एडवर्ड बाल्फोर ने स्पष्ट रूप से सैनी को माली से अलग रूप में स्वीकार किया है. जो बात अधिक दिलचस्प है वह यह है कि एडवर्ड बाल्फोर ने पाया कि सब्जी की खेती के अलावा सैनी काफी हद तक गन्ने की खेती में शामिल थे जबकि माली केवल बागवानी करते थे. एडवर्ड बाल्फोर का विवरण इस प्रकार आगे और पुष्टि प्रदान करता है, इबेट्सन के विवरण में निहित विरोधाभास के अलावा, कि सैनियों को औपनिवेशिक काल में मालियों से पूरी तरह से अलग समझा जाता था.
ईएएच ब्लंट के अनुसार मतभेद
ईएएच ब्लंट, जिन्होंने उत्तरी भारत की जाति व्यवस्था पर एक मौलिक काम का सृजन किया, सैनी को माली, बागबान, कच्ची और मुराओ से पूरी तरह से अलग समूह में रखा. उन्होंने सैनी को भू-स्वामी माना जबकि बाद के समूहों को मुख्यतः बागवानी, फूल और सब्जियों की खेती करने वाले बताया. ब्लंट के काम का महत्व इस बात में निहित है कि उनके पास अपने से पूर्व के सभी औपनिवेशिक लेखकों जैसे इबेट्सन, रिसले, हंटर आदि के कार्यों को देखने और उनकी विसंगतियों का पुनरीक्षण करने का लाभ था.
उत्तर उपनिवेशवादी विद्वानों द्वारा स्वीकार किया गया विभेद
पंजाब में माली और सैनी समुदाय के बीच अंतर के बारे में कोई भ्रम नहीं है और सैनी को कहीं भी माली समुदाय के रूप में नहीं समझा जाता है. लेकिन हरियाणा में, कई माली जनजातियों ने अब 'सैनी' उपनाम को अपना लिया है जिससे इस राज्य में और इसके दक्षिण की ओर सैनी की पहचान को उलझन में डाल दिया है. हरियाणा के माली और सैनी के बीच स्पष्ट अंतर बताते हुए 1994 में प्रकाशित एक एंथ्रोपोलॉजीकल सर्वे ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट निम्नलिखित तथ्य उद्धृत करती है:

"उनमें से कई बड़े जमींदारों हैं. अतीत के दौरान इसके अलावा, माली समुदाय शाही दरबारों में कार्य करता था और मुख्य रूप से बागवानी का काम करता था, लेकिन सैनी दूसरों की सेवा नहीं करते थे; बल्कि वे स्वतंत्र किसान थे. अरेन, रेन, बागबान, माली और मलिआर ऐसे व्यक्तियों के निकाय का द्योतक हैं जो जाति के बजाय व्यवसाय को दर्शाते हैं...1) माली अन्य जातियों से भोजन स्वीकार करने में उतने कट्टर नहीं हैं जितने सैनी; 2) माली औरतों को खेतिहर मजदूर के रूप में श्रम करते देखा जा सकता था जो सैनी में नहीं होता था; 3) शैक्षिक रूप से, व्यवसाय के आधार पर और आर्थिक रूप से सैनी की स्थति माली से कहीं बेहतर थी, और 4) सैनी भू-स्वामी हैं और माली की तुलना में विशाल भूमि के स्वामी हैं."

प्रेम, स्त्रीवाद और सामाजिक क्रान्ति की कवि सावित्रीबाई फुले
      सावित्रीबाई की जीवनगाथा उनके असाधारण साहस और सत्यनिष्ठा को प्रतिबिम्बित करती है। ललिता धारा बता रही हैं कि 19वीं सदी के महाराष्ट्र में सावित्रीबाई को जाति, वर्ग और लिंग की दीवारें उनके संकल्पों को पूरा करने से रोक न सकीं

19वीं सदी के महाराष्ट्र का शायद ही कोई ऐसा सार्वजनिक व्यक्तित्व होगा, जिसे इतना कम जाना-समझा गया है, जितना कि सावित्रीबाई फुले को। उनके गृह प्रदेश महाराष्ट्र में भी उन्हें मुख्यतः महात्मा फुले की पत्नी या अधिक से अधिक लड़कियों को पढ़ाने वाली पहली भारतीय महिला के रूप में जाना जाता है। परंतु सावित्रीबाई का व्यक्तित्व बहुआयामी था। उन्होंने कई ऐसे काम किए, जिनके बारे में उनसे पहले किसी ने सोचा भी न था। वे एक ऐसी सामाजिक कार्यकर्ता थीं, जो जाति और लिंग से जुड़े मुद्दों को न केवल अपनी लेखनी और अपने भाषणों द्वारा उठाती थीं वरन वे मैदानी स्तर पर काम करने से भी पीछे नहीं हटती थीं। सावित्रीबाई, पहली आधुनिक क्रांतिकारी मराठी कवियत्री मानी जाती हैं। उनका पहला काव्य संग्रह ‘काव्य फुले’, सन 1854 में प्रकाशित हुआ था। उस समय तक महात्मा फुले की कोई कृति प्रकाशित नहीं हुई थी। यह उस दौर की बात है जब महिलाओं का सार्वजनिक जीवन में प्रवेश पूरी तरह निषिद्ध था और उनकी रचनाओं के प्रकाशन की बात तो कोई सोच ही नहीं सकता था।

सावित्रीबाई कौन थीं और उन्होंने क्या किया, इसे समझने के लिए हमें उनके व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं को समझना होगा। हमें सावित्रीबाई के जीवन और उनके कार्यों को 19वीं सदी के महाराष्ट्र के सामाजिक तानेबाने के परिप्रेक्ष्य में देखना होगा।

जनता की सावित्री

सावित्रीबाई का जन्म पुणे के निकट नाईगांव नामक गांव में 3 जनवरी, 1831 को हुआ था। वे शूद्र समुदाय के खांडोजी नेवशे पाटील की सबसे बड़ी संतान थीं। उस काल में लड़कियों को-चाहे वे किसी भी जाति की हों-शिक्षित नहीं किया जाता था। सावित्रीबाई भी इसका अपवाद नहीं थीं। वे घर के कामकाज निपटाती थीं और खेती के काम में अपने पिता की मदद करती थीं।

जब सावित्रीबाई नौ साल की थीं, तब उनका विवाह पुणे निवासी 13 वर्षीय जोतिराव फुले से कर दिया गया। जोतिराव, माली जाति के थे जो शूद्र वर्ण का हिस्सा थी। शूद्र, पारंपरिक रूप से या तो खेती अथवा बागवानी करते थे या बुनकर, कुम्हार इत्यादि थे। उन्हें नीची जाति का माना जाता था। इस समुदाय से शिक्षा प्राप्त करने की अपेक्षा नहीं की जाती थी। उन्हें तो बस अपने से ऊपर के तीनों वर्णों, अर्थात ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों, की सेवा करनी होती थी। इन सब सामाजिक वर्जनाओं के बावजूद, अगर जोतिराव अंग्रेज़ी शिक्षा पा सके तो इसका कारण था उनकी बाल विधवा मौसी सगुनबाई, जिन्होंने उनकी माँ की मृत्यु के बाद जोतिराव का पालन-पोषण किया।

सगुनबाई ने जोतिराव को न केवल पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया वरन उन्हें एक मिशनरी स्कूल में दाखिला भी दिलवाया। जोतिराव एक प्रतिभाशाली और संवेदनशील विद्यार्थी थे। वे न केवल पढ़ाई-लिखाई में अच्छे थे वरन थोड़ा बड़े होते ही वे ग्रामीण इलाकों के रहवासियों, जिनमें वे भी शामिल थे, की बदहाली के कारणों और उन्हें दूर करने के उपायों पर विचार करने लगे। मिशनरी स्कूलों में शिक्षा प्राप्त करने के कारण उन्हें पश्चिमी साहित्य का अध्ययन करने का अवसर मिला और इससे उनकी सोच समतावादी बनी। उन्होंने अमरीकी प्रजातंत्र और फ्रांस की राज्य क्रांति का अध्ययन किया। वे थामस पेन की पुस्तक ‘राईट्स आफ मेन’ से बहुत प्रभावित थे, विशेषकर पेन के तर्कसंगत विचारों से।

19वीं सदी में महाराष्ट्र की सांस्कृतिक राजधानी पुणे, परिवर्तन के दौर से गुज़र रही थी। पेशवाओं का शासन सन 1818 में समाप्त हो चुका था और औपनिवेशिक शासक धीरे-धीरे पुणे और आस-पास के क्षेत्र में मज़बूत हो रहे थे। इससे इस इलाके में स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के पश्चिमी मूल्यों का प्रसार हुआ और नतीजे में हुए पुनर्जागरण से साहित्य, संगीत, कला, रंगकर्म सहित कोई क्षेत्र अछूता न रह सका। अन्य शहरी शिक्षित युवा पुरूषों की तरह, फुले भी महाराष्ट्र में चल रही आधुनिकता की आंधी से प्रभावित हुए बिना न रह सके। इसी दौर में वह समाज सुधार आंदोलन भी शुरू हुआ, जिसने अगली एक सदी में समाज को अधिक मानवीय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

आधुनिक विचारों से प्रेरित होकर जोतिबा ने अपनी पत्नी सावित्री और मौसी सगुनबाई को स्वयं पढ़ना-लिखना सिखाना शुरू किया। अपने पति से प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण करने के बाद, सावित्री ने अहमदनगर में औपचारिक शिक्षा पाई और उसके बाद पुणे से शिक्षक प्रशिक्षण प्रमाणपत्र हासिल किया। शिक्षक प्रशिक्षण विद्यालय में उनके साथ पढ़ती थीं फातिमा शेख, जो उनकी गहरी मित्र बन गईं।

जल्दी ही फुले दम्पत्ति ने लड़कियों के लिए अपना पहला स्कूल खोला। यह स्कूल पुणे के भिड़ीवाड़ा इलाके में 15 मई, 1848 को खोला गया। सावित्रीबाई इस स्कूल की प्रधानाध्यापिका थीं और सगुनबाई व फातिमा शेख, शिक्षक। इस स्कूल में सभी जातियों की लड़कियां एक साथ पढ़ती थीं। स्कूल में पहले ही साल 25 लड़कियों ने दाखिला लिया। इसी साल, फुले दंपत्ति ने अछूत लड़कियों के लिए भी एक स्कूल शुरू किया। ज़ाहिर है, ऐसा करके वे ज्ञान पर ब्राह्मण पुरूषों के एकाधिकार को चुनौती दे रहे थे, जिन्होंने सदियों से अछूतों और स्त्रियों को शिक्षा से वंचित कर रखा था। सन 1848 व 1852 के बीच, फुले दंपत्ति ने 18 स्कूल शुरू किए।

सावित्रीबाई, सगुनबाई और फातिमा देश की पहली भारतीय महिला शिक्षक थीं। इससे भी महत्वपूर्ण यह था कि वे तीनों ही हाशिए पर पड़े समुदायों से थीं। सावित्री और सगुनबाई शूद्र थीं और फातिमा मुसलमान। फातिमा जोतिबा फुले के निकट मित्र उस्मान शेख की बहन थीं।

ज्ञान के द्वार महिलाओं और उनमें भी नीची जातियों की महिलाओं के लिए खोलना, ऊँची जातियों के रूढ़िवादी वर्ग को अस्वीकार्य था। उन्होंने जोतिराव के पिता गोविंदराव को उनके खिलाफ भड़काना शुरू कर दिया। गोविंदराव पर इतना अधिक दबाव बनाया गया कि एक दिन उन्होंने अपने पुत्र से कह दिया कि या तो वे स्कूल चलाएं या उनके घर में रहें। सावित्री और जोतिराव, दोनों को इससे बहुत धक्का लगा परंतु भारी मन से उन्होंने जोतिराव के पिता का घर छोड़ने का निर्णय लिया। जब वे अपना घर छोड़कर निकले, तब वे खाली हाथ थे। उन्होंने अपने व्यक्तिगत सुख की जगह समाज की भलाई को प्राथमिकता दी। उस्मान शेख ने उन्हें अपने घर पर पनाह दी और उन्हें ज़िंदगी फिर से शुरू करने के लिए आवश्यक साधन उपलब्ध करवाए।

जब सावित्री अपने स्कूल जाने के लिए निकलती थीं तब गांववाले उन पर पत्थर और गोबर फेंकते थे। जब भी ऐसा होता, वे रूक कर विनम्रतापूर्वक उनसे कहतीं, ‘‘मेरे भाईयों, मैं आपकी बहनों को पढ़ाने का काम कर रही हूं। जो पत्थर और गोबर आप मुझ पर फेक रहे हैं, वे मुझे रोकेंगे नहीं बल्कि वे तो मेरे लिए प्रेरणा का स्त्रोत हैं। मुझे तो ऐसा लगता है कि मानो आप मुझ पर फूलों की पंखुड़ियों की वर्षा कर रहे हों। मैं मेरी बहनों की सेवा करने के अपने प्रण पर कायम रहूंगी और ईश्वर से यह प्रार्थना करूंगी कि वो आपको आशीर्वाद दे’’। एक दिन जब वे स्कूल से लौट रही थीं तब भारी भरकम शरीर वाले एक गुंडे ने उनका रास्ता रोक लिया और उन्हें यह धमकी दी कि अगर उन्होंने मांगों और महारों को पढ़ाना बंद नहीं किया तो उन्हें इसकी भारी कीमत चुकानी होगी। तमाशा देखने वहां बहुत लोग इकट्ठा हो गए परंतु किसी ने सावित्रीबाई की मदद करने की कोशिश नहीं की। सावित्रीबाई तनिक भी विचलित नहीं हुईं और उन्होंने उस आदमी को एक ज़ोरदार तमाचा जड़ दिया। वह गुंडा भौचक्का रह गया और तुरंत वहां से भाग निकला। तमाशबीन भी तितर-बितर हो गए। यह खबर पुणे में जंगल की आग की तरह फैल गई और उसके बाद किसी ने सावित्रीबाई को रोकने की हिम्मत नहीं की।

फुले दंपत्ति की क्रांतिकारी शैक्षणिक गतिविधियों का कड़ा विरोध शुरू हो गया। अंग्रेज़ी बोलने वाले ऊँची जातियों के समाज सुधारक भी महिलाओं को शिक्षित करने के हामी थे परंतु वे उन्हें केवल इतनी शिक्षा देना चाहते थे, जिससे वे पढ़े-लिखे पुरूषों की उपयुक्त संगिनी बन सकें और अपने बच्चों को बेहतर ढंग से पालपोस सकें। इसके विपरीत, फुले, महिलाओं को इसलिए शिक्षित करना चाहते थे ताकि वे सशक्त बन सकें, अपने दमन और शोषण के खिलाफ खड़ी हो सकें और अपनी क्षमताओं को पहचान सकें।

जोतिराव फुले के इस मिशन में उनकी पहली और सबसे महत्वपूर्ण सहयोगी बनीं उनकी पत्नी सावित्रीबाई।

स्कूल खोलने के बाद, फुले दंपत्ति ने अपना ध्यान अन्य सामाजिक बुराईयों पर केन्द्रित किया। उस समय बाल विवाह आम थे और इनका प्रचलन ऊँची जातियों में अधिक था। अक्सर कम उम्र की लड़कियों की शादी उनसे आयु में बहुत बड़े पुरूषों से कर दी जाती थी और नतीजे में वे बचपन में ही विधवा हो जाती थीं। विधवाओं के लिए समाज में कोई जगह नहीं थी। उन्हें अपवित्र और अपशकुनी समझा जाता था और उनसे यह अपेक्षा की जाती थी कि वे चुपचाप, बिना कोई शिकायत किए अपना जीवन काटें। बाल विधवाएं, जिनमें से कई कुंवारी होती थीं, को रंगीन साड़ियां और गहने पहनना मना था। वे अपने बालों में फूल तक नहीं लगा सकती थीं। उन्हें सफेद या भगवा रंग की साड़ियां पहननी होती थीं और उनके सिर मूंड दिए जाते थे। इस सब का उद्देश्य यह था कि इन महिलाओं में यौन संबंध बनाने की इच्छा खत्म हो जाए और उनकी वेशभूषा ऐसी हो कि कोई पुरूष उनकी ओर आकर्षित न हो। विधवा होने का अर्थ था सामाजिक और सेक्स जीवन का अंत। परंतु विडंबना यह थी कि विधवाएं अपने ही परिवारों के पुरूषों की हवस का शिकार बनती थीं। चूंकि वे अशिक्षित होती थीं और आर्थिक रूप से परिवार पर निर्भर रहती थीं, इसलिए वे इस शोषण का विरोध नहीं कर पाती थीं। कई बार जब वे गर्भवती हो जाती थीं तब उनके पास इसके सिवा कोई रास्ता न बचता था कि वे या तो अपनी जान ले लें या अपने बच्चे की या फिर दोनों की।

पुणे में एक ब्राह्मण विधवा काशीबाई के साथ यही हुआ। उनका यौन शोषण किया गया और वे गर्भवती हो गईं। हताशा में उन्होंने अपने नवजात शिशु को कुएं में फेक दिया। उन पर हत्या का मुकदमा चला और उन्हें आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई।

इस घटना ने फुले दंपत्ति को बहुत व्यथित किया और ब्राह्मण बाल विधवाओं के घोर यंत्रणापूर्ण जीवन की ओर उनका ध्यान आकर्षित किया। सन 1863 में उन्होंने अपने घर के दरवाजे गर्भवती बाल विधवाओं के लिए खोल दिए। उन्होंने ब्राह्मणवाड़ा (ब्राह्मणों का मोहल्ला) में दीवारों पर पोस्टर चिपकाए, जिसमें गर्भवती बाल विधवाओं को उन्होंने अपने घर आने का निमंत्रण दिया। उन्होंने कहा कि विधवाएं उनके घर पर रहकर अपने बच्चे को जन्म दे सकती हैं। इसके बाद वे चाहें तो अपने बच्चे सहित वहीं रह सकती हैं या बच्चे को छोड़कर या उसे साथ लेकर जा सकती हैं। गर्भवती बाल विधवाओं के सामने अब बहुत से विकल्प उपलब्ध थे, जबकि इसके पहले तक उनके सामने केवल एक ही रास्ता था-अपनी जान लेना। सावित्रीबाई, गर्भवती बाल विधवाओं और उनके बच्चों की स्वयं देखभाल करती थीं। बाल विधवाओं के कष्टों ने उन्हें इतना व्यथित किया कि उन्होंने पुणे के नाइयों को इस बात के लिए राज़ी कर लिया कि वे बाल विधवाओं का मुंडन करने से इंकार कर दें।

सावित्रीबाई और जोतिराव की कोई संतान नहीं थी। जोतिराव पर यह दबाव था कि वे किसी और स़्त्री से विवाह कर लें ताकि वे अपने वारिस को जन्म दे सकें। जोतिराव ने ऐसा करने से इंकार कर दिया। उनका तर्क था कि ऐसा भी हो सकता है कि संतान न होने का कारण वे स्वयं हों तो क्या ऐसे स्थिति में सावित्रीबाई को दूसरे पुरूष से विवाह करने की इजाज़त दी जाएगी। फुले दपंत्ति ने एक बच्चा गोद लेने का निर्णय लिया। सन 1874 में एक रात मूठा नदी के किनारे टहलते समय जोतिराव की नज़र एक महिला पर पड़ी, जो अपना जीवन समाप्त करने के लिए नदी में कूदने को तैयार थी। जोतिराव ने दौड़कर उसे पकड़ लिया। उस स्त्री ने उन्हें बताया कि वह विधवा है और उसके साथ बलात्कार हुआ था। उसे छह माह का गर्भ था। जोतिराव ने उसे सांत्वना दी और अपने घर ले गए। सावित्रीबाई ने खुले दिल से उस स्त्री का अपने घर में स्वागत किया। उस स्त्री ने एक बच्चे को जन्म दिया, जिसका नाम यशवंत रखा गया। फुले दंपत्ति ने यशवंत को गोद ले लिया और उसे अपना कानूनी उत्तराधिकारी घोषित किया। उन्होंने यशवंत को शिक्षित किया और वो आगे चलकर डाक्टर बना। दूसरे स्रोतों के अनुसार यशवंत की माता जोतिराव फुले के परिचित ब्राह्मण की विधवा बहन थी, जो अपने किसी रिश्तेदार के द्वारा गर्भ धारण कर चुकी थी और घर के लोगों द्वारा इसके लिए प्रताड़ित हो रही थी। जोतिबा और सावित्रीबाई ने न सिर्फ उसकी जचगी करवाई बल्कि उसके बेटे यशवंत को गोद भी लिया।यह तथ्य कि फुले दंपत्ति ने स्वयं संतान को जन्म देने की जगह एक अनजान स्त्री के बच्चे को गोद लेने का निर्णय किया, अपने सिद्धांतों और विचारों के प्रति उनकी गहरी प्रतिबद्धता को प्रदर्शित करता है। यह कर उन्होंने जाति, वंश, मातृत्व, पितृत्व इत्यादि के संबंध में प्रचलित रूढ़िवादी धारणाओं को खुलकर चुनौती दी।

ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक व्यवस्था, जहां महिलाओं को जंजीरों में कैद रखना चाहती थी, वहीं वह कथित अछूतों को भी समाज के हाशिए पर धकेलती थी और उन्हें पशुवत जीवन जीने पर मजबूर करती थी। वे ऊँची जातियों के लोगों के सामने से नहीं गुज़र सकते थे और ना ही सार्वजनिक कुओं और तालाबों से पानी भर सकते थे। फुले दंपत्ति ने सन 1868 में यह घोषणा की कि उनके घर के प्रांगण में बने कुंए से कोई भी अछूत पानी भर सकता है। यह एक अत्यंत साहसिक कदम था, जिसने जातिगत यथास्थितिवादियों को हिला दिया।

सावित्रीबाई ज़मीनी स्तर पर काम करने में विश्वास रखती थीं। वे लगातार पुणे के आसपास के गांवों की यात्राएं करती रहती थीं, जहां वे महिलाओं और पुरूषों को सामाजिक बुराईयों का त्याग करने और अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए शिक्षा हासिल करने की प्रेरणा देती थीं। कर्ज, शराबखोरी और शिक्षा जैसे विषयों पर उनके भाषण प्रकाशित हैं और वे यह सिद्ध करते हैं कि सावित्रीबाई को आमजनों से कितना प्रेम था और वे उनकी भलाई के बारे में कितनी चिंतित थीं।

फुले दंपत्ति यह मानता था कि अंतरजातीय विवाह, जाति प्रथा के उन्मूलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। वे ऐसे लोगों की व्यक्तिगत रूप से सहायता करते थे जो अंतरजातीय विवाह करने के इच्छुक थे। इसके लिए उन्होंने कई मौकों पर पुलिस की मदद भी ली। उन्होंने कड़े विरोध का सामना करते हुए कई विधवाओं के पुनर्विवाह करवाए।

जोतिराव फुले का स्वप्न था, लोगों को ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मकता और जाति की दासता से मुक्त करवाना। इसके लिए उन्होंने एक साथ कई मोर्चों पर काम करना शुरू किया। उन्होंने ब्राह्मणवादी हिन्दू धर्म की समालोचना करते हुए एक पुस्तक लिखी, जो इस विषय पर प्रकाशित पहली पुस्तक थी। उन्होंने महिलाओं और दमित जातियों को शिक्षित करने का अभियान चलाया और इस सबसे आगे बढ़कर, उन्होंने भारत के दमित लोगों – स्त्री, शूद्र और अतिशूद्र – की एकता पर बल दिया। उनका मानना था कि अगर ये तीनो वर्ग एकजुट हो सके तो वे स्वयं को दासता से मुक्त कर सकेंगे और अपने अधिकार हासिल कर पायेंगे। इसी उद्देश्य से उन्होंने 24 सितंबर, 1873 को सत्यशोधक समाज नामक संस्था की स्थापना की, जो एक नए सामाजिक-आध्यात्मिक आंदोलन की जनक बनी।

सावित्री, सत्यशोधक समाज की महिला इकाई की प्रमुख थीं। इस समाज की बैठक हर सप्ताह पुणे में आयोजित होती थी, जिसमें महिलाओं की शिक्षा और विधवा पुनर्विवाह जैसे मुद्दों पर चर्चा होती थी। अक्सर पूरे परिवार इस संस्था के सदस्य बनते थे। सत्यशोधक समाज ने आमजनों को पुरोहितों के चंगुल से निकालने के लिए बिना ब्राह्मण पंडितों और धार्मिक कर्मकांडों के विवाह करवाने शुरू किए। इन विवाहों में वर और वधु केवल यह शपथ लेते थे कि वे एक-दूसरे के प्रति समर्पित रहेंगे और समाज की भलाई के लिए काम करेंगे। इन विवाहों से भारत में अंतर्जातीय और अंतरधार्मिक सिविल विवाहों की नींव पड़ी।

सत्यशोधक समाज ने जाति और लिंग से जुड़े मुद्दों पर बहस और चर्चा के लिए मंच उपलब्ध करवाया। फुले ने सतीप्रथा – जिसके अंतर्गत महिलाएं अपने पति की चिता पर स्वयं को भस्म कर लेती थीं – की कड़ी निंदा की। उन्होंने पूछा कि क्या किसी महिला की मृत्यु पर उसका पति, उसकी चिता पर बैठकर अपना जीवन समाप्त करने के लिए तैयार है।

सन 1870 के दशक में फुले दंपत्ति ने अकाल पीड़ितों की मदद के लिए बहुत काम किया। उन्होंने अकाल के कारण अनाथ हो गए बच्चों के लिए 52 रहवासी स्कूल स्थापित करने में मदद की।

महात्मा फुले की मृत्यु 28 नवंबर, 1890 को हो गई। उनके अंतिम संस्कार में भी सावित्रीबाई ने अनूठे साहस का प्रदर्शन किया। शमशान घाट में जब यह बहस शुरू हुई कि अंतिम संस्कार गोद लिए हुए पुत्र द्वारा किया जाना चाहिए या किसी रिश्तेदार द्वारा, तो सावित्रीबाई ने आगे बढ़कर यह कहा कि वे स्वयं अपने पति को मुखाग्नि देंगी और उन्होंने ऐसा किया भी। आज भी किसी हिन्दू पत्नी द्वारा अपने पति की चिता को अग्नि देना बहुत हिम्मत का काम माना जाता है। आज से सवा सौ साल पहले सावित्रीबाई ने यह कर दिखाया था। इस घटना से समाज में माने भूचाल सा आ गया। इससे यह पता चलता है कि सावित्रीबाई की सोच कितनी स्वतंत्र और मौलिक थीं और वे अपने विचारों और सिद्धांतों को अपने व्यक्तिगत जीवन में भी लागू करती थीं।

अपने पति की मृत्यु के बाद, सावित्रीबाई ने सत्यशोधक समाज का नेतृत्व संभाल लिया। उन्होंने सासवाण में 1893 में आयोजित समाज की बैठक की अध्यक्षता की। सन 1896 के अकाल में सावित्रीबाई ने अनवरत लोगों की सहायता की और सरकार पर यह दबाव बनाया कि वह राहत कार्य शुरू करे। सन 1897 में पुणे में प्लेग की महामारी फैली। हमेशा की तरह, सावित्रीबाई एक बार फिर पीड़ितों की सेवा में जुट गईं। प्लेग ने उन्हें भी नहीं छोड़ा और 10 मार्च, 1897 को इस बीमारी के कारण उनका निधन हो गया।

सावित्रीबाई एक व्यक्ति के रूप में

सावित्रीबाई एक सार्वजनिक व्यक्तित्व तो थीं हीं, उनका एक नितांत निजी व्यक्तित्व भी था, जिसके कई रंग थे। मैंने सावित्रीबाई के रचनात्मक लेखन के आधार पर उनके मोहक व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं को प्रस्तुत करने की कोशिश की है।

सावित्रीबाई की कविताओं का पहला संग्रह, ‘काव्य फुले’ 1854 में प्रकाशित हुआ था। तब वे महज़ 23 वर्ष की थीं। यह मानने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए कि उन्होंने इन कविताओं को कम से कम दो-तीन साल पहले लिखना शुरू किया होगा, अर्थात जब उनकी उम्र 20 वर्ष के आसपास रही होगी। उनकी कविताओं में गंभीर विचार थे तो श्रृंगार रस भी। उनकी कविताओं में चंचलता थी तो अभिलाषाएं और स्वप्न भी। उनकी रचनाओं से वे एक ऐसी महिला के रूप में उभरती हैं जो विवेकशील, आधुनिक, प्रगतिशील, प्रतिबद्ध, आत्मविश्वास से परिपूर्ण और जीवंत है। मैंने उनकी कविताओं को अलग-अलग शीर्षकों के अंतर्गत वर्गीकृत कर उनके व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं को उजागर करने का प्रयास किया है।

क्रांतिकारीः उनकी कविताओं के निम्न छंद, सावित्री की तत्कालीन सामाजिक यथार्थ की समझ को प्रतिबिम्बित करते हैं। वे व्यवस्था में अंतर्निहित शोषण की कड़े शब्दों में निंदा करती हैं। उनकी भाषा सीधी और तीखी है और जाति व लिंग के मुद्दों पर वे अपनी बात बिना किसी लागलपेट के कहती हैं:

मनु कहते हैं
रीतिरिवाजों का आधार है भेदभाव,
धूर्त और कुटिल लोगों की यह नीति कितनी अमानवीय है।
क्या उन्हें मनुष्य कहा जाए?
पौ फटने से गोधुली तक, महिला करती है श्रम,
पुरूष उसकी मेहनत पर जीता है, मुफ्तखोर,
पक्षी और जानवर भी एक साथ मिलकर काम करते हैं,
क्या इन निकम्मों को मनुष्य कहा जाए?

तितली और कली
वह उसके सुंदर रूप को मसल डालता है,
वह तूफान के मानिन्द उस पर टूट पड़ता है,
वह उसके मधु को सोख लेता है,
और फिर उस निष्प्राण क्लांत, शरीर को ठुकरा देता है…
…कौनसी कली?
वह पूछता है, पुराने को भूलना और नए को ढूंढना उसका काम है,
धोखे और स्वच्छंदता की यह दुनिया,
मैं भौचक्की हूं इसे देखकर, सवित्री कहती हैं।

स्वतंत्र सोचः सावित्री आज के मानकों के हिसाब से भी बहुत आधुनिक थीं। वे परंपरा, अंधश्रद्धा और अंधविश्वासों पर प्रश्न उठाती थीं और मनुष्यों से उनकी अपेक्षा यह थी कि वे एक-दूसरे और प्रकृति के साथ समन्वय से रहें।
अंग्रेज़ी, माँ (एक)
रस्मों-रिवाजों का जुआ उतार फेंको,
परंपरा के द्वार को बलपूर्वक खोल दो।
संकल्प
एक चिकना गोल पत्थर, उस पर तेल और कुमकुम का लेप,
और देखो, वह कैसे बन जाता है देवगणों का हिस्सा।
भैंसे और न जाने क्या-क्या, कितने डरावने हैं ये भगवान,
फिर भी लोग मानते हैं उन्हें अपना तारणहार…
…अगर पत्थर सुन सकते प्रार्थना और उन्हें दे सकते बच्चे,
तो फिर पुरूषों और महिलाओं की शादी की ज़रूरत ही क्या है?
मनुष्य और प्रकृति
आओ हम मनुष्यों की इस दुनिया को संवारें और बढ़ें आगे,
सभी भयों और तनावों से मुक्त हों, जियें और जीने दें ,
मनुष्य और सारी सृष्टि एक ही सिक्के के दो पहलू हैं,
इस अमूल्य संपदा की रक्षा के लिए हम हाथ मिलाएं।

रूमानीः सावित्रीबाई के व्यक्तित्व का एक रूमानी पक्ष भी था, जो सदियों के अनुकूलन और समाज द्वारा महिलाओं पर थोपी गई वर्जनाओं के बावजूद, उनकी कविताओं में खुलकर सामने आता है। उनकी निम्न पंक्तिओं में कामोन्माद का प्रचंड प्रवाह देखें।
बावली कविता और बावला कवि
(वह फरिश्ता) शर्मीली सी है उसकी मुस्कुराहट,
मधुर हैं उसकी बातें, वह उसे उसकी ओर खींचता है,
और आवेग में चूम लेता है।
सुनहरी चंपा
जैसे मदन करता है आकर्षित अपनी प्रियतमा रति को,
वैसे ही चंपा जगाती है कवि की संवेदनाएं,
…वह देती है आनंद और ऐन्द्रिक सुख,
पारखी को करती है प्रसन्न और फिर नष्ट हो जाती है।
जाई फूल
…एकदम शुभ्र, नशीली खुशबू से लबरेज़,
वह अपनी कोमल चमक से करता है मुझे प्रफुल्लित।
उसकी मीठी मुस्कुराहट और शर्मीली नज़र,
मेरे दिमाग को ले जाती है किसी दूसरी दुनिया में।

स्वप्नदृष्टाः ‘काव्य फुले’ (1854) में सावित्रीबाई की कविताएं, उन्हीं विचारों को प्रगट करती हैं जो जोतिबा फुले द्वारा लिखित ‘गुलामगिरी’ (1873) में उपस्थित हैं। इसे दर्शाने के लिए मैंने ‘गुलामगिरी’ के कुछ अंशों की तुलना ‘काव्य फुले’ की कविताओं से की है।
हमारी भूमि के मूलनिवासियों के बारे में

‘काव्य फुले’ से

अंग्रेज़ी, माँ (एक)
भारत किसी का नहीं है,
ना ईरानियों का, ना यूरोपीयों का, ना तातारों का और ना हूणों का,
उसकी नसों में बहता है यहां के मूलनिवासियों का रूधिर।
‘शूद्र’ शब्द का अर्थ
‘शूद्र’ का असली अर्थ था मूलनिवासी,
परंतु शक्तिशाली विजेताओं ने ‘शूद्र’ को बना दिया एक गाली।
ईरानियों और ब्राह्मणों, ब्राह्मणों और अंग्रेज़ों,
सब पर अंतिम विजय प्राप्त की शूद्रों ने, क्रांतिकारी थे वे।
मूलनिवासी थे समृद्ध,
वे ‘भारतीय’ के नाम से जाने जाते थे।
ऐसे वीर थे हमारे पूर्वज,
और हम इन लोगों के वंशज हैं।
गुलामगिरी से

…ब्राह्मण इस देश के मूलनिवासी नहीं थे। सुदूर अतीत में, शायद आज से तीन हज़ार साल पहले, आज के ब्राह्मणों के पुरखे, हिन्दुकुश के मैदानी इलाके और उससे जुड़े क्षेत्र में दाखिल हुए।

…वे उस विशाल भारतीय/यूरोपीय नस्ल की प्रशाखा थे, जिससे एशिया में ईरानी, मीड्स और एशिया के अन्य ईरानी देशों के नागरिक और यूरोप के मुख्य देशों के रहवासी उत्पन्न हुए (पृष्ठ 27)।

…जो आर्य भारत आए वे सामान्य प्रवासी नहीं थे और ना ही उनका इरादा शांतिपूर्ण तरीके से यहां अपने उपनिवेश का निर्माण करना था। वे विजेता के रूप में आए…

…जिन मूलनिवासियों को आर्यों ने अपना गुलाम बनाया या विस्थापित किया, उनके द्वारा आर्यों का जिस दृढ़ता से मुकाबला किया गया, उससे ऐसा प्रतीत होता है कि वे साहसी और निडर थे। उनके लिए आर्यों द्वारा शूद्र (तुच्छ), महारी (बड़ा शत्रु), अथयंज, चांडाल इत्यादि जैसे तिरस्कारपूर्ण शब्दों का उपयोग किए जाने से ऐसा लगता है कि इन लोगों ने आर्यों के इस देश में स्वयं को स्थापित करने के प्रयास का सबसे कड़ा विरोध किया था और इसलिए आर्य उनसे द्वेष रखते थे और घृणा करते थे…(पृष्ठ 27)।
बाली के राज्य की समृद्धि पर

काव्य फुले से

राजा बाली की स्तुति
बाली राज्य का शासक था पुण्यात्मा दानव-राज,
बाली उदार था और उसके प्रजाजन थे प्रसन्न, उन्हें किसी चीज़ की कमी न थी,
उसके राज में सभी थे संतुष्ट, तीनों लोक उसके गुण गाते थे,
उसके स्वतंत्र देश में वैज्ञानिक विमर्श होते थे,
पवित्र यज्ञ की ज्वाला हमेशा रहती थी प्रकाशित, दान में दिया जाता था सोना,
रत्न जड़ित मुकुट पहनकर शाही युगल, करता था दान पुण्य,
उनकी पत्नी विन्ध्यावली हमेशा उनके साथ रहती थीं,
आईए, हम उस शासक युगल को याद करें और मिलकर उसकी प्रशंसा के गीत गाएं…
हे पावन नेक आत्मा, राजा बाली,
लोग प्रतिदिन करते हैं आपकी स्तुति।
मधुर स्मृतियां
हर किसान हो महान राजा बाली की तरह सदाशय,
और मेरा गांव हो बाली के काश्यापुर जैसा समृद्ध।

गुलामगिरी से
…परंतु आगे चलकर, पददलितों का महान हिमायती, पवित्रों में पवित्रतम, महान मनीषी और सत्य का शोधक बाली राजा इस दुनिया में आया… (पृष्ठ 73)।
…उसने (बाली राजा) अपने दरिद्र, दमित बंधुओं को गुलामी की जंजीरों से मुक्त किया… और धरती पर ईश्वर का राज स्थापित करने का उद्यम किया…(पृष्ठ 74)।
जातिच्युतों पर

‘काव्य फुले’ से
जातिच्युतों की व्याधि
दो हज़ार साल से जातिच्युत इस व्याधि से पीड़ित हैं,
यह व्याधि है बंधुआ मज़दूरी की, ज़मींदार धकेलते रहे हैं उन्हें गुलामी में।
खेती ईश्वरीय है
…जो खेतों में करते हैं मशक्कत, वे जातिच्युत हैं,
वे पैदा करते हैं उस भोजन को जिसे ऊँची जातियां उड़ाती हैं…
शूद्रों की निर्भरता
जातिच्युत और अछूत हैं पीड़ित हैं अज्ञानता से,
भगवान, धर्म, रस्मोरिवाज़ और निर्धनता से।

गुलामगिरी से

सैंकड़ों सालों से शूद्रों और अतिशूद्रों ने ब्राह्मणों के शासन में अनेकानेक कष्ट भुगते और अत्यंत निम्न परिस्थितियों में जीवनयापन किया है…(पृष्ठ 36)।
…ब्राह्मणों ने उन्हें ज्ञान से वंचित कर जहालत की दयनीय अवस्था में धकेल दिया है…
…वे गरीब, अज्ञानी लोगों को यह समझाने में सफल रहे हैं कि ईश्वर की दृष्टि में भी उनकी गुलामी औचित्यपूर्ण है…(पृष्ठ 37)।

…लोगों को अपने चंगुल में फंसाए रखने के लिए उन्होंने पौराणिकता का अलौकिक जाल बुना, जाति का विधान बनाया और क्रूर व अमानवीय कानूनों की संहिताओं का निर्माण किया…

…इन झूठों को गढ़ने के पीछे उनका मुख्य लक्ष्य था अज्ञानियों को मूर्ख बनाना और उन्हें गुलामी की जंज़ीरों में हमेशा के लिए बांध देना…(पृष्ठ 30)।
मनु, मनुवाद और ब्राह्मण वर्चस्व पर
काव्य फुले से

 मनु कहते हैं
जो लोग खेतों में करते हैं काम और पकड़ते हैं हल का मूठ,
वे जड़बुद्धि हैं, कहते हैं मनु।
और ब्राह्मणों के लिए क्या है उनकी आज्ञा?
मनुस्मृति कहती है ‘‘खेत में श्रम न करो’’…
अंग्रेज़ी माँ (एक)
…असंख्य चालों से ब्राह्मणवादी धर्म,
‘शूद्रों’ का करता है शोषण और उन पर अपशब्दों की वर्षा…
शूद्रों की निर्भरता
बिना कोई काम किए ब्राह्मण सन्यासी घूमते हैं एक जगह से दूसरी जगह और मांगते हैं भिक्षा,
और शूद्रों से कहते हैं कि निशुल्क सेवा है पवित्र।
गुलामगिरी से

सबसे ज्यादा अधिकार, सबसे ज्यादा सुविधाएं और सबसे बड़े उपहार, जो ब्राह्मणों के जीवन को आसान और प्रसन्न बना सकें वे (जाति की संस्था में) विशेष रूप से शामिल किए गए, जबकि शूद्रों और अतिशूद्रों को यह संस्था घोर घृणा और तिरस्कार की दृष्टि से देखती थी और उन्हें सामान्य मानवीय अधिकार भी उपलब्ध नहीं थे… उन्हें केवल संपत्ति समझा जाता था…(पृष्ठ 29)।

…पिछली अनेक पीढ़ियों से वे (शूद्र व अतिशूद्र) गुलामी और दासता की बेड़ियों में जकड़े हुए हैं… प्रभुत्वशाली ब्राह्मण केवल उनके पसीने पर जीते थे और उन्हें उनकी भलाई की कोई चिंता नहीं थी… (पृष्ठ 31)।

अंग्रेज़ तारक
काव्य फुले से
अंग्रेज़ी, माँ (एक)
अंग्रेज़ी शासन साथ लाया है जाति के आतंक से मुक्ति,
अंग्रेज हमारे तारक हैं।
अंग्रेजी, माँ (दो)
अंग्रेज़ी माँ उन्हें दिलाती है उनकी पशुवत जिंदगी से मुक्ति,
उसके मार्गदर्शन में शूद्रों को मिलती है मानवीय गरिमा।
‘गुलामगिरी‘ से

अंग्रेज़ों ने उन्हें (शूद्र और अतिशूद्र) ब्राह्मणों की कैद से मुक्त किया और उन्हें व उनकी संतति को सुख के दिन दिखाए। अगर अंग्रेज़ नहीं होते तो ब्राह्मण उन्हें पीस डालते (पृष्ठ 44)।

सावित्री फुले के ‘काव्य फुले’ (1854) और जोतिबा फुले की ‘गुलामगिरी’ (1873) की इस तुलना से हम निम्न निष्कर्षों पर पहुंच सकते हैं:

सावित्रीबाई इन विचारों की मूल स्त्रोत थीं और जोतिबा ने आगे चलकर उनके विचारों को विकसित किया और उन्हीं के आधार पर अपनी प्रसिद्ध व अभिनव कृति ‘गुलामगिरी’ लिखी।
जोतिबा के मन में इन विचारों ने 1850 के दशक में ही जन्म ले लिया था और उन्होंने सावित्री से अपने विचार सांझा किए। सावित्री ने इन विचारों को आत्मसात किया और ये विचार उनके रचनाकर्म में झलके।
अगर हम यह भी मान लें कि दूसरा निष्कर्ष सही है, अर्थात सावित्री को यह विचार उनके पति जोतिराव से मिले, तब भी हमें यह स्वीकार करना होगा कि वे एक बहुत अच्छी शिष्या थीं और जो उन्हें सिखाया गया, उन्होंने उसे आत्मसात किया। उनकी कविताओं से यह जाहिर है कि उन्हें अपने विचारों पर पक्का विश्वास था और वे अपने पाठकों को भी अपने विचारों से सहमत करने में सक्षम थीं। हमें जोतिबा की भी प्रशंसा करनी होगी कि उन्होंने अपनी युवा पत्नी से अपने विचार सांझा किए। आने वाले समय में जोतिबा शोषितों की मुक्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले हैं, यह सावित्री ने बहुत पहले ही समझ लिया था। वे अपनी कविताओं में स्पष्ट शब्दों में यह भविष्यवाणी करती हैं।

भोर का आलाप
जोतिबा हैं अछूतों के क्षितिज का सूरज,
जिसकी चमक अतुलनीय है।

वे जोतिबा को पददलितों के मसीहा के रूप में देखती हैं और यह तब, जब जोतिबा ने मानवता की भलाई के लिए काम करना शुरू ही किया था। इस अर्थ में वे एक भविष्यदृष्टा थीं। अगले 30 वर्षों में जो घटा उससे यह साबित हुआ कि वे सही थीं।

साहित्यकार सावित्री
सावित्री की कविताओं का एक और संग्रह ‘‘बावन काशी सुबोध रत्नाकर’’ (असली मोतियों का सागर) सन 1891 में प्रकाशित हुआ। यह छंद में महात्मा फुले – जिस नाम से जोतिराव अपने जीवन के अंतिम काल में जाने जाते थे – की जीवनी है। जोतिबा ने प्राचीन और मध्यकाल में मराठाओं के इतिहास की ब्राह्मणवादी व्याख्या के परखच्चे उड़ा दिए थे। सावित्रीबाई का यह कविता संग्रह उनके महान पति के बारे में तो है ही, वह मराठा इतिहास के बारे में भी है। सावित्री ने भारतीय इतिहास पर जोतिबा के चार भाषणों को संपादित कर उन्हें प्रकाशित भी करवाया था। सावित्री के कुछ भाषण 1892 में प्रकाशित हुए थे।

जोवित्री: सावित्री और जोतिबा के परस्पर रिश्ते
जोतिबा और सावित्री के रिश्ते इस अर्थ में असाधारण थे कि वे पति-पत्नी से ज्यादा एक-दूसरे के मित्र थे। वे एक-दूसरे के प्रति और अपने सामाजिक सरोकारों के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध थे। उनके बीच पूर्ण सामांजस्य था और उनके रिश्ते प्रसन्नता से परिपूर्ण थे। यह उनकी निम्नांकित कविताओं से स्पष्ट है। सबसे बड़ी बात यह है कि वे एक-दूसरे को बराबरी का दर्जा देते थे। ध्यान दीजिए कि सावित्री अपने पति का नाम लेती हैं। यह उस दौर में क्रांतिकारी ही कहा जा सकता है।

 पारिवारिक सुख का पथ
जोतिबा मेरे जीवन को आनंद से भरते हैं,
जैसे मधु भरती है, फूल को,
मैं सौभाग्यशाली हूं, इतने विख्यात व्यक्ति का साथ पा,
मेरी खुशी की कोई सीमा नहीं है…

जोतिबा उनके शिक्षक थे और उन्होंने ही सावित्री के व्यक्तित्व को गढ़ा। उन्होंने न केवल सावित्रीबाई को साक्षर बनाया बल्कि उनके मन में ज्ञान पिपासा और समाज का भला करने की उत्कट इच्छा भी उत्पन्न की। यह उनकी कविताओं में झलकता है।

जोतिबा को सलाम
मैं जोतिबा को करती हूं सलाम, अपने ह्दय की गहराईयों से,
वे देते हैं हमें ज्ञान का अमृत और आशा, जीने का एक नया तरीका,
महान जोति कमजोर, अछूतों और जातिच्युतों का आव्हान करते हैं,
हमें देते हैं ज्ञान का उपहार और हमारे अतीत को करते हैं पुनर्जीवित,

जोतिबा की शिक्षाएं
मैं जोतिबा, मेरे प्रिय सरताज, का करती हूं अभिवादन,  ,
उनके मधुर शब्द गूंजते हैं मेरे कानों में,
मैं जातिच्युत महार-मांग की करती हूं सेवा,
मेरे सरताज की यादें मेरे दिल में बसी हुई हैं…
…मैं जोतिबा के शब्दों पर करती हूं विचार, उन्हें मेरे मन में गुनती हूं,
जो परोपकार के लिए करते हैं काम, वे महान मानव कहलाते हैं।
जोतिबा की शिक्षाएं हैं अनुभव से उपजीं,
मैं, सावित्री, उन्हें अपने दिल के सबसे अंदरूनी कोने में रखती हूं संभालकर

सावित्रीबाई द्वारा जोतिबा को लिखे गए तीन पत्र, साहित्य की अमूल्य निधि हैं। ये पत्र उन्होंने तब लिखे थे जब वे अपने माता-पिता के घर पर थीं। उस दौर में महिलाएं पत्र नहीं लिखा करती थीं और अपने पति को पत्र लिखने का तो प्रश्न ही नहीं था। इन पत्रों में वे अपने पति को उनके नाम से संबोधित करती हैं और सामाजिक विषयों पर अपने विचार प्रकट करती हैं। ऐसा लगता है मानो दो मित्र या अभिन्न साथी अपनी सार्वजनिक और निजी जिंदगी के बारे में एक-दूसरे से संवाद कर रहे हों। इन पत्रों से उनके बीच का परस्पर प्रेम और विश्वास जाहिर होता है।

मैं यहां इनमें से एक मार्मिक पत्र को उद्धृत कर रही हूं।

29 अगस्त, 1867
नायगांव, पेटा खंडाला,
सतारा
सत्य के मूर्त रूप, मेरे सरताज, जोतिबा,
सावित्रीबाई आपको नमस्कार करती है।
मुझे आपका पत्र मिला। हम लोग यहां ठीक हैं। मैं अगले माह की पांच तारीख तक आऊंगी। आप मेरी चिंता न करें। इस बीच यहां एक अजीब घटना घटी। पूरी कहानी इस प्रकार है। गणेश नाम का एक ब्राहमण गांव-गांव घूमकर पूजा-पाठ करवाता था और लोगों को उनका भविष्य बतलाता था। यही उसके जीवनयापन का जरिया था। गणेश और शरजा नाम की एक किशोरी, जो महार (अछूत) समुदाय से थी, में प्रेम हो गया। जब लोगों ने उन्हें पकड़ा तब उसे छःह माह का गर्भ था। उन्हें जुलूस में गांव में घुमाया गया और लोगों ने यह धमकी दी कि उन दोनों को मार डाला जाएगा।
मुझे हत्या की इस योजना के बारे में पता लगा। मैं उस जगह गई और मैंने लोगों को डराया कि अंग्रेजी कानून में प्रेमी युगल की जान लेने के कितने गंभीर परिणाम हो सकते हैं। मेरी बात सुनने के बाद उन्होंने अपना इरादा त्याग दिया।
साधुभाऊ ने गुस्से में कहा कि इस कुटिल ब्राहमण और अछूत लड़की को गांव छोड़ देना चाहिए। दोनों इसके लिए राजी हो गए। मेरे हस्तक्षेप से इस युगल की जान बच गई। वे मेरे पैरों पर गिरकर रोने लगे। मैंने किसी तरह उन्हें सांत्वना दी और चुप कराया। अब मैं उन दोनों को आपके पास भेज रही हूं।
और क्या लिखूं?
आपकी
सावित्री
निःसंदेह ‘जोवित्री‘ 21वीं सदी के प्रतिमानों से भी सच्चे अर्थों में एक आधुनिक दंपत्ति थे।
विरासत
फुले दंपत्ति एक-दूसरे के बहुत नजदीक थे और प्रेम के अटूट बंधन में बंधे हुए थे। वे एक-दूसरे से प्रेम करते थे, एक-दूसरे का सम्मान करते थे और एक-दूसरे के प्रति पूरी तरह वफादार थे। वे एक-दूसरे के और अपने सामाजिक कार्यों के प्रति प्रतिबद्ध थे।
सावित्री शायद आधुनिक भारत की पहली ऐसी महिला थीं, जिसकी रचनाएं प्रकाशित हुईं। जिस दौर में सभी वर्गों की महिलाओं को दबाया और कुचला जाता था, उस समय उन्होंने अपनी आवाज बुलंद की। इस कार्य में उनके पति और गुरू जोतिबा ने उनके साथ सक्रिय सहयोग किया और उन्हें लगातार प्रोत्साहन दिया।
सावित्री अपने समय का महान व्यक्तित्व थीं। वे अपने पति की योग्य और प्रतिबद्ध जीवनसाथी तो थीं हीं, वे अपने आप में भी एक क्रांतिकारी नेता थीं। ढेर सारी बाधाओं के बावजूद वे एक प्रेरणास्पद और निपुण शिक्षक, नेता, चिंतक और लेखक बनीं।
सावित्रीबाई की जीवनगाथा उनके असाधारण साहस और सत्यनिष्ठा को प्रतिबिम्बित करती है। 19वीं सदी के महाराष्ट्र में सावित्रीबाई को जाति, वर्ग और लिंग की दीवारें उनके संकल्पों को पूरा करने से रोक न सकीं।
संदर्भः
ब्रजरंजन मणि, पमेला सरदार, संपादित, ए फोरगोटन लिबरेटरः द लाईफ एंड स्ट्रगल ऑफ़ सावित्रीबाई फुले, माउंटेन पीक, नई दिल्ली, 2008
देशपांडे जी.पी., सिलेक्टिड राईटिंग्स ऑफ़ जोतिराव फुले, लेफ्ट वर्ड, 2002
हरि नारके, दन्यनज्योति सावित्रीबाई फुले, सावित्री फुले मेमोरियल लेक्चर, एनसीईआरटी, 2010
हरि नारके, संपादित, साहित्य अणि चलवल, मराठी, महाराष्ट्र सरकार, 2006
ललिता धारा, संपादित, फुलेस एंड वीमेन्स क्वेश्चन, डा. अंबेडकर कालेज ऑफ़ कामर्स एंड इकोनोमिक्स, मुंबई, 2011
ललिता धारा, संपादित, काव्य फुले (अंग्रेज़ी अनुवादः उज्जवला माथरे), डा. अंबेडकर कॉलेज ऑफ़ कामर्स एंड इकोनोमिक्स, मुंबई, 2012
एम.जी. माली, क्रांतिज्योति सावित्रीबाई जोतिराव फुले, आशा प्रकाशन, गरगोटी, 1980
डा. एम.जी. माली, सावित्रीबाई फुले-समग्र वांग्मय, महाराष्ट्र राज्य साहित्य संस्कृति मंडल, मुंबई, 2006 (प्रथम संस्करणः 1988)
डा. के.पी. देशपांडे, अग्निफुलेः सावित्रीबाई फुले यांची कविताः स्वरूप अणि समीक्षा, नूतन प्रकाशन, पुणे, 1982